राम जेठमलानी जीवनी हिंदी में – Ram Jethmalani jeevni , biography in Hindi

राम जेठमलानी जीवनी हिंदी में – Ram Jethmalani jeevni , biography in Hindi

जन्म – 14 सितंबर 1923 , शिकारपुर ,सिंध ,(वर्तमान पाकिस्तान में )
मृत्यु – 8 सितंबर 2019
कार्यक्षेत्र – कानूनविद , राजनीतिज्ञ, पूर्व केंद्रीय मंत्री

राम भूलचंद जेठमलानी एक जाने माने राजनीतिज्ञ और प्रसिध्द भारतीय वकील थे ।वे बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व कानून मंत्री रह चुके थे । विवादास्पद मामलों के मुकदमें की पैरवी करने और उच्च प्रोफ़ाइल के कारण अपने वकालत कैरियर के समय कई बार राम जेठमलानी को कड़ी आलोचना का सामना भी करना पड़ा था ।ऐसा माना जाता है। कि वे कुछ मामलों पर निशुल्क पैरवी करते थे और कुछ मामलों में भारतीय उच्चतम न्यायालय के सबसे महंगे वकीलों में से एक रहे ।
अपने जीवन शैली के कारण और मुकदमों के साथ साथ वक्तव्यों के कारण भी कई बार सुर्खियों में रहते थे।उन्होंने कानून की डिग्री मात्र 17 साल की उम्र में प्राप्त कर ली । और अगले वर्ष अठारह साल की उम्र में प्रैक्टिस के लिए जाने लगे ।(हालांकि उस समय वकालत की प्रैक्टिस करने के लिए इक्कीस साल अनिवार्य थे । लेकिन 18 साल के जेठमलानी के लिए एक विशेष प्रस्ताव पास करके प्रैक्टिस करने की इजाज़त दे दी गई ।)
राम जेठमलानी भारत के राज्यसभा और लोकसभा के मेंबर रह चुके हैं और अटल बिहारी वाजपई की सरकार के समय शहरी विकास मंत्री और कानून मंत्री भी रह चुके हैं।

प्रारंभिक जीवन

14 सितंबर 1923 को राम जेठमलानी का जन्म सिंध के शिकारपुर (वर्तमान पाकिस्तान ) में हुआ । उनके फादर का नाम भुलचंद गुरूमुखदास जेठमलानी और मदर का नाम पार्वती भूलचंद था ।राम जेठमलानी की बाल शिक्षा स्थानीय स्कूल में हुई ।अपनी होशियारी और बुद्धि के कारण उन्हें दो बार नियमित क्लास से अगली क्लास में प्रोन्नत किया गया जिसके चलते मात्र तेरह साल की आयु में राम जेठमलानी ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली ।
कराची के एस सी साहनी लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री 17 साल की उम्र में प्राप्त करके अगले साल प्रैक्टिस में उतरे लेकिन सरकार द्वारा निर्धारित प्रैक्टिस करने के लिए 21 साल की उम्र निर्धारित थी लेकिन 18 साल के जेठमलानी के लिए विशेष छूट देकर प्रैक्टिस करने की अनुमति दी गई ।उसके पश्चात उन्होंने एलएलएम की डिग्री प्राप्त की ।
राम जेठमलानी की शादी 18 साल की उम्र में दुर्गा से कर दी गई ।ठीक 1947 के देश विभाजन से कुछ समय पहले उन्होंने रत्न साहनी जो पेशे से वकील थी उनसे भी शादी रचाई ।दोनों पत्नियों के चार बच्चे हुए – शोभा , जनक,रानी,महेश।

करियर
करियर की शुरुआत राम जेठमलानी ने सिंध में एक प्रोफ़ेसर के तौर पर की ।उन्होंने अपने मित्र ए के ब्रोही (जो पाकिस्तान के कानून मंत्री बने ) के साथ मिलकर एक लॉ फर्म की स्थापना कराची में की । कराची में विभाजन के बाद जब 1948 में दंगे भड़के तो ब्रोहि ने ही उन्हें पाकिस्तान छोड़कर भारत लौटने की सलाह दी ।
उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में 1953 में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया ।यहां के छात्रों को स्नातक व स्नातकोत्तर के स्तर पर पढ़ाने लगे । उन्होंने वायने स्टेट यूनिवर्सिटी (अमेरिका के डेट्रॉयट) में इंटरनेशनल लॉ भी पढ़ाया।
बे के एम नानावती और महाराष्ट्र राज्य के चर्चित मुकदमें के दौरान सन् 1959 में चर्चा में आए। जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ (जो भारतीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे )भी इस मुकदमें में उनके साथ थे ।
तस्करों के बचाव में राम जेठमलानी 1960 के दशक में अदालत में उनके साथ खड़े दिखाई दिए इसके बाद “तस्करों के वकील” लोगों के द्वारा कहां जाना लगा ।उन्होंने बिना परवाह किए आलोचकों के लिए कहा कि मैं तो सिर्फ एक वकील का फ़र्ज़ अदा कर रहा हूं ।वे “बार काउंसिल ऑफ इंडिया “ के चार बार अध्यक्ष रह चुके हैं।वे इंटरनेशनल बार काउंसिल के भी सदस्य रह चुके हैं।
राजनीतिक करियर
उल्लास नगर क्षेत्र से पहली बार 1971 में लोकसभा चुनाव के लिए लड़े ,लेकिन सफलता नहीं मिली ।1975-77 )देश में आपातकाल के समय राम जेठमलानी बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष थे ।उस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री की कड़ी आलोचना करने पर उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हुआ जिसके परिणास्वरूप उन्हें देश छोड़कर कनाडा जाना पड़ा ।बाद में आपातकाल ख़तम होने पर वापिस लौट आए।

1977 के लोकसभा चुनाव में आपातकाल के बाद, पहली बार एच आर गोखले को बॉम्बे लोकसभा क्षेत्र से असफल करके लोकसभा में प्रवेश किया ।परंतु इस बार भी कानून मंत्री नहीं बन पाए । क्योंकि उनकी जीवन शैली से मोरारजी देसाई खुश नहीं थे ।इसके पश्चात एक मर्तबा 1980 में फिर लोकसभा चुनाव जीता ।सुनील दत्त के विरुद्ध 1985 चुनाव में हार गए ।

राज्य सभा के लिए 1988 में चुना गया और वाजपेई सरकार में 1996 में न्याय और कंपनी मामलों व कानून मंत्री के पद को संभाला ।एक बार फिर 1999 में कानून मंत्री बनाया गया ।लेकिन तत्कालीन न्यायधीश ए एस आंनद (सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश ) पर उनके दिए गए विवादास्पद टिप्पणी करने पर अटल जी ने उन्हें अपनी सरकार से मंत्री पद छोड़ने को कहा।
एक बार फिर लोकसभा चुनाव के लिए लखनऊ में अटल बिहारी वाजपई के विरुद्ध खड़े होकर करारी हार का सामना करना पड़ा।
भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान से उन्हें 2010 में एक बार फिर राज्य सभा का सदस्य बनाया । “भारतीय जनता पार्टी “ के नेताओं पर (2012 ) में यूपीए सरकार के दौरान हुए घोटाले पर चुप्पी साधने का उलाहना देते हुए तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष नितिन गड़करी को पत्र लिखा जिसके पश्चात 6 साल के लिए मई 2013 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया ।

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निधन
8 सितंबर 2019 को उनके खराब स्वास्थ्य के चलते नई दिल्ली में उनके घर पर उनका निधन हुआ ।उनके बेटे महेश के अनुसार वे कुछ दिन ,महीनों से ठीक नहीं थे ।

राम जेठमलानी की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें ।

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डॉ राम मनोहर लोहिया का जीवन परिचय ।

डॉ राम मनोहर लोहिया जीवन परिचय -Ram Manohar Lohia biography in Hindi

डॉ राम मनोहर लोहिया जीवन परिचय -Ram Manohar Lohia biography in Hindi


राम मनोहर लोहिया
राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी
जन्म -23 मार्च 1910, अकबरपुर, फैज़ाबाद
निधन – 12 अक्टूबर 1967 , नई दिल्ली
कार्य क्षेत्र -स्वतंत्रता सेनानी,राजनेता

राम मनोहर लोहिया एक प्रखर समाजवादी और स्वतंत्रता सेनानी और सम्मानित राजनीतिज्ञ थे ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी दिलाने में अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अतुल्य योगदान दिया ।उनमें से एक सपूत राम मनोहर लोहिया भी रहे ।वे एक आशावादी और बेहद साहसी व्यक्तितव के कर्मठ व्यक्ति थे ।उनका जीवन चरित्र प्रगतिशील विचारधारा रखने वाले जनमानस के लिए सदैव प्रेरणादायक बना रहा ।
आज़ादी की लड़ाई में और सत्य के पथ पर मनोहर अटूट विश्वास के साथ लड़ते रहे । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत की राजनीति में बहुत नेता आए जिन्होंने अपने अटूट विश्वास के दम पर राजनीति का रुख बदल कर रख दिया ।राम मनोहर लोहिया भी उन्हीं में से एक थे ।
अपनी देशभक्ति और समाजवादी विचारधारा को बुलंद आवाज़ के साथ जनता के बीच पहुंचाने के लिए जाने गए ।और इन्हीं गुणों के कारण अपने समर्थकों और विरोधी दलों में भी खूब वाहवाही बटोरी ।

राम मनोहर लोहिया का प्रारंभिक जीवन

23 मार्च 1910 को उतर प्रदेश के अकबरपुर में राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ । उनके पिता का नाम श्रीहीरालाल था पेशे से एक शिक्षक व दिल से सच्चे राष्ट्रभक्त थे ।मनोहर की माता भी अध्यापिका थी ।मनोहर जब बहुत छोटे थे तब उनकी मां का निधन हो गया था ।
अपने पिता के साथ युवा मनोहर को अलग अलग रैलियों और विरोध प्रदर्शन व सभाओं के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हिसा लेने की प्ररेणा मिली ।
उनके जीवन में नया मोड़ लाना वाला समय तब था जब मनोहर के पिता उन्हें अपने साथ महात्मा गांधी से मिलाने के लिए साथ लेकर गए ।मनोहर के पिता महात्मा गांधी के बहुत बढ़े अनुयाई थे ।मनोहर महात्मा गांधी के सोच और विचारों से काफी प्रेरित हुए ।तभी से जीवनभर गांधी के आदर्शों का पालन और समर्थन करते रहे ।
पंडित जवाहलाल नेहरू से पहली बार 1921 में मिले।और उनके साथ कुछ सालों तक उनकी देखरेख में काम किया ।लेकिन कुछ राजनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों का आपसी टकराव हुआ और दूरियां बना ली।
1928 में किशोर लोहिया ने मात्र 18 साल की उम्र में ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित “साइमन कमीशन “ का विरोध किया और विरोध प्रदर्शन का आयोजन भी खुद संभाला ।

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राम मनोहर लोहिया प्रथम श्रेणी से मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद इंटरमीडिट में दाखिला हिंदी विश्वविदयालय बनारस में लिया ।उसके बाद अपनी स्नातक की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय से पूरी की और पी. एच. डी. शोध के लिए विश्वविद्यालय बर्लिन , जर्मनी चले गए ।जहां से 1932 में पीएचडी पूरी की । उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक परफॉर्मेंस के लिए उन्हें वितीय सहायता भी मिली ।

राम मनोहर लोहिया की विचारधारा

भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में मनोहर ने अंग्रेज़ी से अधिक हिंदी को प्राथमिकता दी।उनका मानना था कि “अंग्रेज़ी” शिक्षित और अशिक्षित समाज के बीच दूरी पैदा करता है।उनका कहना था कि हिंदी के बोलचाल से नए राष्ट्र के निर्माण से जुड़े विचारों को बढ़ावा मिलेगा ।
वे जातिवाद और भेदभाव के घोर विरोधी थे ।उनका जाति व्यवस्था पर सुझाव था कि “रोटी और बेटी “ के माध्यम से जातपात को समाप्त किया का सकता हैं।
उनका कहना था कि जाति भेदभाव दूर हो और सभी लोग मिलजुलकर रहे और खाना खाएं और उच्च और निम्न वर्ग का विवाह रिवाज़ सरल रूप से बिना किसी ऊंच नीच के संपन्न हो ।

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इस प्रकार “यूनाइटेड सोसिलिस्ट पार्टी “ में उच्च पदों पर किए गए चुनाव के टिकट निम्न जाति के उम्मीदवार को देकर भी उन्हें प्रोत्साहन और बढ़ावा दिया ।वे बेहतर स्कूलों की स्थापना और समान शिक्षा के अवसर पर भी अपने विचार रखते थे ।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
राम मनोहर लोहिया बचपन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में प्रबल इच्छा के साथ जाना चाहते थे ।जो बड़े होकर भी उनके मन में ये सोच अपनी जगह बनाती रही ।जब मनोहर यूरोप में थे तो वहां पर यूरोपीय भारतीयों के लिए एक क्लब की स्थापना की जिसका नाम “एसोसिएशन ऑफ यूरोपियन इंडियन” रखा ।जिसका मुख्य उद्देशय भारत के लोगों में भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जागरूकता लाना था ।
मनोहर ने “लीग ऑफ नेशनस “ में भी भाग लिया ।ब्रिटिश राज्य के एक सहयोगी के रूप में भारत का प्रतिनिधत्व एक बीकानेर के महाराजा द्वारा किया गया था लेकिन लोहिया इसके अपवाद थे ।
दर्शक गैलरी में विरोध प्रदर्शन शुरू किया और समाचार पत्रों के माध्यम से अपने विरोध के कारणों को पत्रिकाओं के संपादकों को कई पत्र लिखे।इस पूरे घटनाक्रम ने उस समय में रातों रात राम मनोहर लोहिया को भारत में विख्यात प्रसिद्धि दिलाई थी ।
भारत लौटने पर भारतीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए और सन्1934 में कांग्रेस सॉसिलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी ।पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1936 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया ।

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देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने और उत्तेजक बयान देने के लिए 24 मई 1939 को पहली बार गिरफ्तार किए गए ।लेकिन उनके समर्थकों और युवाशक्ति के डर से उन्हें अगले दिन ही रिहा कर दिया गया ।
“सत्याग्रह नाउ” नामक लेख लिखने पर 1940 में राम मनोहर लोहिया को पुन: गिरफ्तार कर लिया गया ।और अगले दो वर्ष के लिए कठोर कारावास भेज दिया । बाद में 1941 में उन्हें आज़ाद किया गया ।“भारत छोड़ो आन्दोलन” के दौर में सन् 1942 में मौलाना आज़ाद , महात्मा गांधी , वल्लभ भाई पटेल जैसे कई बड़े हस्तियों के साथ राम मनोहर लोहिया को भी गिरफ्त में लिया गया ।

इसके पश्चात मनोहर दो बार जेल गए एक दफा उन्हें मुंबई से गिरफ्तार कर लाहौर भेज दिया। स्वतंत्रता के नजदीकी समय के दौरान उन्होंने अपने भाषणों और लेखों के माध्यम से देश के विभाजन का विरोध किया था ।वे हिंसा के खिलाफ थे
और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत की आज़ादी के जश्न में जब सभी लोग और नेता दिल्ली में इक्कट्ठे थे उस समय राम मनोहर लोहिया अवांछित विभाजन के प्रभाव (दुख ) की वजह से महात्मा गांधी के साथ दिल्ली से बाहर थे ।

स्वतंत्रता के पश्चात गतिविधियां
राम मनोहर लोहिया राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए आज़ादी के बाद भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपना कार्य करते रहे ।उन्होंने आम जनता और निजी भागीदारों से अपील करते हुए कहा ,कि नेहरों , बाबड़ी , कुओं , सड़कों का निर्माण कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण में भागीदार बनें।

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राम मनोहर लोहिया ने “तीन आना , पंद्रह आना “ के माध्यम से प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर किए जाने वाले खर्च की राशि को “एक दिन 25000 रुपए “ के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। जो आज भी लोगों में बहुचर्चित हैं। उस समय के दौर में बहुत से लोगों की आमदनी भारत में मात्र “तीन आना” थी ।जबकि “पंद्रह आना” भारत सरकार के योजना आयोग के डाटा के हिसाब से थी ।

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Ram Manohar Lohia ,उन सभी मुद्दों को जनता के सामने रखा जो लंबे समय से राष्ट्र की सफलता में बाधा बनते रहे ।अपने लेखन और भाषण के माध्यम से उन्होंने जागरूकता की मुहिम शुरू की और जातिगत भेदभाव ,अमीर गरीब , स्त्री पुरुष असमानताओं को दूर करने का कार्य किया ।
उन्होंने “हिन्द किसान पंचायत “ का कृषि संबधित समस्याओं को देखते हुए संगठन बनाया।वे सीधे तौर पर सरकार से जारी की गई केंद्रीय योजनाओं को जनता के हाथों में देकर सीधे तौर पर उन्हें लाभ पहुंचाने और शक्ति प्रदान करने के पक्षधर थे ।अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने देश के युवाओं के साथ भारतीय साहित्य व कला और राजनीति जैसे विषयों पर चर्चा की ।

चौधरी चरण सिंह की जीवनी पढ़े ।

निधन
57 साल की उम्र में 12 अक्टूबर 1967 को नई दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया ।वर्तमान समय में इस अस्पताल का नाम डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल हैं।

राम मनोहर लोहिया की वीडियो बायोग्राफी देखें।

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एम करुणानिधि की जीवनी पढ़े ।

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राम मनोहर लोहिया जीवनी परिचय
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चौधरी चरण सिंह की जीवनी, परिचय,हिन्दू में – Choudhary Charn Singh Biography, Early Life,In Hindi , Article

चौधरी चरण सिंह की जीवनी, परिचय,हिंदी में – Choudhary Charn Singh Biography, Early Life,In Hindi , Article

जन्म – 23 दिसंबर 1902 यूनाइटेड प्रोविंस , नूरपुर, ब्रिटिश इंडिया
मृत्यु – 29 मई 1987
कार्य – भारत के पूर्व प्रधानमंत्री , राजनेता

भारत के पांचवे प्रधानमंत्री पद के रूप में चौधरी चरण सिंह ने  कार्य किया वे एक राजनेता रहे ।किसानों की आवाज.  बुलंद   करने वाले  नेता के संदर्भ में चौधरी चरण सिंह को भारत में “किसानों के मसीहा” के रूप में जाना जाता  है।  हालांकि  प्रधानमन्त्री के  तौर पर उनका कार्यकाल  बहुत  कम रहा । प्रधानमंत्री पद से पूर्व उन्होंने उप- प्रधानमंत्री  व गृह मंत्री के रूप में भी अपनी   सेवाएं दी । उत्तर  प्रदेश  राज्य  के  दो  बार मुख्यमंत्री रहे और इस से पहले उन्होंने दूसरे मंत्रालयों में भी कार्यभार संभाला।चौधरी चरण सिंह मात्र पांच महीने तक ही देश के प्रधानमंत्री पद पर रह सके और बाद में त्यागपत्र दे दिया ।

प्रारंभिक जीवन

23 दिसंबर 1902   को चौधरी चरण सिंह का जन्म , यूनाइटेड प्रोविंस (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के गांव नूरपुर में एक किसान परिवार में हुआ । बल्लभगढ़ के राजा नाहर   सिंह  से इनके  परिवार का अच्छा संबध था ।
1887 की  क्रांति  में  इस  राज  परिवार की  मुख्य भूमिका रही थी ।दिल्ली  के चांदनी  चौक  में नाहर  सिंह  को  ब्रिटिश हुकूमत ने  फांसी  पर चढ़ा  दिया था ।नाहर  सिंह के समर्थक और चौधरी चरण सिंह के दादा उतर प्रदेश के बुलंशहर  जिले  में अंग्रजों  के  अत्याचार  से बचने के लिए निष्क्रमण कर गए ।

शैक्षणिक वातावरण चौधरी चरण सिंह को शुरुआत से ही अच्छा  प्राप्त  हुआ जिस  कारण  उनकी शिक्षा के प्रति अच्छी लग्न रही।नूरपुर से उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई  और  मैट्रिकुलेशन  के लिए  उन्हें  सरकारी  स्कूल मेरठ   में  दाखिला   मिल  गया ।  विज्ञान   विषय  में चरण सिंह ने 1923 में ग्रेजुएशन की ।दो साल के बाद चरण सिंह ने 1925 में  कला  वर्ग में स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की ।   इसके   अलावा   उन्होंने  कानून  की   पढ़ाई  आगरा   यूनिवर्सिटी   से  पूरी  की   और  1928  में गाजियाबाद में  वकालत शुरू  की।अपनी ईमानदारी , कर्तव्यनिष्ठा ,और  साफगोई  के  लिए  जाने जाते थे ।उनका मुकदमों को लेने का तरीका ओरों से बिल्कुल अलग था ।वो सिर्फ  उन्हीं  मुकदमों को लेते थे जिसमे मुवकिल का पक्ष उन्हें न्यायपूर्ण प्रतीत होता था ।

राजनैतिक जीवन
1929  में   कांग्रेस के  लाहौर  अधिवेशन  के पश्चात गाजियाबाद  में  कांग्रेस  कमेटी  का गठन किया और सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान चौधरी चरण सिंह को  1930 में  नमक कानून  तोड़ने  पर  6 महीने की सजा  सुनाई  गई । देश के  स्वतंत्रता  संग्राम में  चरण सिंह ने जेल  से रिहा  होने के  बाद  स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया ।

1937,छपरौली  (बागपत)  से  विधान  सभा के लिए मात्र 34 साल की उम्र में चुने गए ।और विधानसभा में कृषकों के  अधिकार  की रक्षा के लिए एक बिल पास किया,  किसानों  द्वारा  ये   बिल  उनकी  फसलों  के विपड़न से संबधित था ।बाद में इस बिल को देश के तमाम राज्यों ने अपनाया ।

गांधी जी द्वारा  किया  व्यक्तिगत सत्याग्रह  में  चौधरी चरण सिंह  को  1940  में गिरफ्तार किया गया ।कुछ महीनों के बाद अक्टूबर 1941 में रिहा किए गए ।जब पूरे  देश  में  1942  में  असंतोष  व्याप्त था ।”भारत छोड़ो” के  माध्यम  से जब गांधी जी ने  “करो या मरो ” का  आह्वान  किया  था ।चरण  सिंह  ने  उस दौरान भूमिगत  होकर  मेरठ, मवाना ,  सर्थना , गाजियाबाद, बुलंदशहर  आदि गांव में प्रचार करके गुप्त क्रांतिकारी संगठन  तैयार  किया ।पुलिस  दिन रात चरण सिंह के पीछे  पड़ी  थी और  अंत में  उन्हें  गिरफ्तार कर लिया गया ।उसके बाद  ब्रिटिश  सरकार द्वारा उन्हें डेढ़ साल की  सजा  सुनाई । उन्होंने “शिष्टाचार”के नाम से एक पुस्तक भी उस दौरान जेल में लिखी ।

स्वाधीनता के बाद

नेहरू  के   सोवियत  पद्वति   पर  आधारित  आर्थिक सुधारों का चरण सिंह ने डटकर विरोध किया । उनका कहना  था  कि  भारत  की खेती  सहकारी पद्वति पर आधारित  सफल  नहीं हो सकती ।किसान परिवार से नाता रखने  वाले चरण सिंह का कहना बिल्कुल साफ था कि  किसान  का मालिकाना हक और दावेदारी ही उन्हें खेती  के क्षेत्र  में आगे बढ़ा सकती हैं।माना जाता है कि चरण  सिंह  के राजनैतिक कैरियर पर नेहरू के सिध्दांतों का विरोध करना उन्हें महंगा पड़ा ।

1952-62-67   में   देश   की  आज़ादी  के  बाद विधानसभा चुनावों में जीतकर राज्य विधानसभा के लिए  चुने  गए ।”पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी ” के  पद  पर पंडित  गोविंद  वल्लभ  पंत  की  सरकार  में   इन्होंने अपनी  सेवाएं  दी । इस  दौरान उन्होंने अपनी सेवाएं  देते हुए न्याय , सूचना , राजस्व, चिकत्सा एवं स्वास्थ्य आदि  विभागों  में  अपने  दायित्व  का  निर्वहन किया । उत्तर  प्रदेश  सरकार  की कैबिनेट मंत्री का पद इन्हे  दिया गया  जिसके  अन्तर्गत  इन्होंने  1951  में न्याय और  सूचना  विभाग  का   कार्यभार  संभाला ।  डॉ संपूर्णानंद  की सरकार में इन्हे 1952 में कृषि विभाग और राजस्व की जिम्मेदारी प्राप्त हुई।

स्वाभाविक   रूप  से  चौधरी चरण  सिंह एक किसान परिवार से थे ।इसी कारण हमेशा से किसानों के हितों के लिए लगातार प्रयास करते रहे ।जब चंद्रभानु गुप्ता 1960 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तब चरण सिंह को कृषि मंत्रालय दिया गया ।

1967 में  चरण सिंह ने  कांग्रेस  पार्टी  छोड़  दी और “भारतीय क्रांति दल ” के नाम  से नई  राजनैतिक दल की  स्थापना  की ।  राम  मनोहर  लोहिया  और  राज नारायण  के  साथ  मिलकर  उन्होंने  उतर  प्रदेश  में सरकार  बनाई  और 1967 और  1979 में प्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभाला।

इंदिरा गांधी ने 1975 देश में आपातकाल घोषित कर दिया और  सभी   राजनैतिक दलों के विरोधी नेताओं को  जेल  में  डाल  दिया गया ,चौधरी  चरण सिंह भी उनमें  से एक थे ।ठीक आपातकाल  के दो  साल बाद 1977 में   आम  चुनाव  हुए  और  इंदिरा  गांधी  की जबरदस्त  हार हुई और केंद्र में मोरारजी के मार्गदर्शन में “जनता पार्टी ” की सरकार बनी। चरण सिंह ने इस सरकार  में  उप  प्रधानमंत्री  और  गृहमंत्री  के पद को संभाला।

प्रधानमंत्री पद

मोरारजी   देसाई  और  चौधरी  चरण सिंह के आपसी मतभेदों  के चलते  या ऐसे कहें की राजनैतिक कलह के कारण  जनता  पार्टी  की सरकार गिर गई ।जिसके बाद 28  जुलाई 1979 को  कांग्रेस और सीपीआई के समर्थन से  प्रधानमंत्री  पद  की शपथ ली।उन्हें बहुमत साबित  करने  के  लिए राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने 20 अगस्त का समय दिया लेकिन इंदिरा गांधी ने ठीक एक दिन पहले ही अपना समर्थन वापस ले लिया इस दौरान  चरण   सिंह   ने  संसद  का  रुख  लिए  बिना प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया ।

निजी जीवन
सन 1929  को  चरण सिंह  का  विवाह गायत्री देवी के साथ हुआ । इनकी  पांच  संताने हुई।अजित सिंह उनके  पुत्र “राष्ट्रीय लोक दल ” पार्टी के अध्यक्ष हैं।

लेखन

चौधरी चरण सिंह एक राजनेता के साथ एक कुशल लेखक भी थे । और  अंग्रजी भाषा पर अच्छी पकड़ रखते थे । उन्होंने” लीजेंड प्रोपराइटरशिप ” इंडियंस पॉवर्टी   एंड    इट्स   सॉल्यूशन ” ऑब्लिशन  ऑफ जमींदारी ”   पुस्तकों  को   लिखा । और  भारत  के साहित्य में अपना लेखकीय योगदान भी दिया ।

चौधरी चरण सिंह की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

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मोरारजी देसाई जीवनी , परिचय ,हिंदी में -Biography of Morarji Desai ,Early Life,in Hindi, Article

मोरारजी देसाई जीवनी , परिचय ,हिंदी में -Biography of Morarji Desai ,Early Life,in Hindi, Article

जन्म – 29 फ़रवरी 1896
मृत्यु – 10 अप्रैल  1995

मोरार्रजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री बने जो उस समय के एकमात्र ऐसे व्यक्ति जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बजाय अन्य राजनीति दल के प्रधानमंत्री रहे। मोरारजी का प्रधानमंत्री कार्यकाल 1977 से  1979 तक रहा । मोरारजी अकेले व्यक्ति रहे जिन्हे भारत में सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न और पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार निशान- ए – पाकिस्तान से नवाजा गया था ।

मोरारजी 81 साल में आज़ाद भारत के चौथे प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।ऐसा नहीं हैं कि इस से पहले उन्होंने कभी प्रधानमंत्री बनने की कोशिश न की हो ,कई बार की ,लेकिन असफल रहे।और ऐसा भी नहीं था कि मोरारजी प्रधानमंत्री बनने के योग्य नहीं थे। वरिष्ठ नेता होने के बाद भी कांग्रेस में वे दुर्भाग्यशाली रहे कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री के मृत्यु के पश्चात भी प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त नहीं हुए। मार्च 1977 में मोरारजी देश के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए , लेकिन कुछ राजनैतिक कलह के चलते इनका कार्यकाल पूरा नहीं हो पाया ।और चौधरी चरण सिंह के साथ मतभेदों के बढ़ते उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा ।

प्रारभिंक जीवन परिचय

गुजरात के भदेली नामक स्थान पर मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी  1896 को हुआ था ।उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था ।उनके पिता का नाम  रनछोड़जी देसाई था वे स्कूल अध्यापक के तौर पर भावनगर (सौराष्ट्र) में कार्यरत थे ।वे निराशा और खिन्नता के साथ अवसाद का शिकार हो चुके थे ।और इसके चलते उन्होंने आत्महत्या करके कुएं में कूद कर अपना जीवन समाप्त कर लिया ।तीसरे दिन मोरारजी देसाई ने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात शादी कर ली।

व्यावसायिक जीवन

मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से मोरारजी की शिक्षा – दीक्षा पूरी हुई और ये कॉलेज उस समय के सबसे महंगा और खर्चीला कॉलेज माना जाता था ।मुंबई में गोकुलधाम तेजपाल के नाम से प्रसिद्द आवास गृह में मोरारजी निशुल्क रहे। उस आवास में एक साथ चालीस विद्यार्थी रह सकते थे। मोरोराजी देसाई विद्यार्थी जीवन में एक औसत बुद्धि के विवेकशील छात्र थे ।वाद – विवाद टीम का सचिव कॉलेज में इन्हे ही बनाया जाता था ।मुश्किल से कभी स्वयं मोरोर्जी ने वाद – विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लिया होगा ।कॉलेज जीवन से ही मोरारजी देसाई अक्सर बाल गंगाधर तिलक , महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू  और अन्य महत्वपूर्ण नेताओं के भाषणों  को सुना करते थे।

1917 में मोरारजी देसाई ने मुंबई प्रोविंशल सिविल सेवा में आवेदन करने का विचार किया और बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर्स में प्रविष्टी पाई । वे बतौर उप जिलाधीश 1918 में अहमदाबाद पहुंचे ।उन्होंने ब्रिटिश कलेक्टर (जिलाधीश) चेटफील्ड के अन्तर्गत काम किया ।लेकिन अपने रूखे स्वभाव के मोरारजी ग्यारह वर्ष तक विशेष पोस्ट पर नहीं पहुंच सके।और कलेक्टर के निजी सहायक  पद तक ही सीमित रहे ।

राजनीतिक जीवन

1930  में ब्रिटिश हुकूमत की नौकरी छोड़कर मोरोजी देसाई स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही बन गए ।उसके एक साल बाद गुजरात प्रदेश के कांग्रेस कमेटी के सचिव बने।उन्होंने सरदार पटेल के निर्देश पर भारतीय युवा कांग्रेस की शाखा स्थापित की और उसके अध्यक्ष पद को संभाला ।मोरारजी को 1932 में दो साल की जेल हुई। बाद में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 1937 तक भारतीय युवा कांग्रेस  को मार्गदर्शन दिया । इसके पश्चात वे बंबई राज्य के कांग्रेस मत्रिमंडल में शामिल हुए ।बताया जाता है। कि मरोराजी देसाई अपनी बातों को आमतौर पर हमेशा ऊपर रखते थे और उन्हें सही मानते थे और लोग इन्हे व्यंगात्मक रूप से “सर्वोच्च नेता ” कहा करते थे । उन्हें ऐसा लोगों के द्वारा कहां जाना पसंद भी आता था ।समाचार पत्रों में अक्सर उनके व्यक्तित्व को लेकर. ऐसे व्यंग्य कार्टून भी प्रकाशित होते थे ।व्यंग्य में इनके चित्र एक लम्बी छड़ी के साथ और गांधी टोपी पहन के दिखाए जाते थे ।इसमें हंसी मजाक में व्यंग्य ये होता था कि, एक अपनी बात पर अड़ियल व्यक्ति जो गांधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं।

मोरारजी देसाई के कई वर्ष जेल में गुजरे जब वे स्वतंत्रता संग्राम में भागीदार रहे ।राष्ट्रीय राजनीति के साथ इनका नाम ,देश की आज़ादी में वजनदार हो चुका था।लेकिन प्राथमिक स्तर की रुचि मोरारजी की राज्य की राजनीति में थी । यही कारण है कि उन्हें 1952 में बंबई का मुख्यमंत्री पद दिया गया ।इस समय में महाराष्ट्र बंबई और गुजरात प्रोविंस के नाम से मशहूर थे ।लेकिन पृथक गठन इन दोनों राज्यों का अभी तक नहीं हुआ था।
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर 1967 को मोरारजी को उप – प्रधानमंत्री बनाया गया लेकिन वे कुछ बातों को लेकर  विशेष रूप से कुंठित थे कि कांग्रेस पार्टी का वरिष्ठ नेता होने पर भी उनकी बजाय इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया ।माना जाता है । कि यही कारण है।मोरारजी निरंतर इंदिरा गांधी के क्रांतिकारी फैसलों और उपायों में बाधा डालते. रहे ।हालांकि जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करने की मांग हुए थी तब मोरारजी भी उस दौड़ में दावेदारी रखने लगे और जब नहीं हटे तब पार्टी ने इस मुद्दे पर चुनाव करवा दिया और भारी मतांतर से इंदिरा गांधी ने बाजी मारी थी ।लेकिन बाद में मोरारजी को उसी सदन में उप प्रधानमंत्री का पद मिला था ।

प्रधानमंत्री पद

कांग्रेस में पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय जो अनुशासन था वो बाद में बिखरने लगा । कुछ पार्टी के नेता खुद को पार्टी से बड़ा समझते थे ।उनमें से मोरारजी देसाई भी एक थे ।कांग्रेस पार्टी के वफादार सिपाही और नेता के रूप में श्री लाल बहादुर शास्त्री ने कार्य किया ।उन्होंने अपने कार्यकाल में पार्टी से कभी भी किसी पद की मांग नहीं की ।लेकिन इस मामले में सबसे ज्यादा अपवाद में मोरारजी देसाई रहे ।उनके मतभेद कांग्रेस पार्टी के साथ जगजाहिर थे।इनकी प्राथमिकताओं में देश का प्रधानमंत्री बनना शामिल था ।
कांग्रेस पार्टी और उनके नेता जब ये समझने लगे कि मोरारजी देसाई उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।तब बहुत से नेताओं के साथ इंदिरा गांधी ने भी उन्हें कतरना आरंभ कर दिया ।
मोरारजी देसाई 1975 में जनता पार्टी में सम्मिलित हो गए और जब लोकसभा चुनाव हुए  तो जनता पार्टी ने कांग्रेस की भ्रष्टचार और आपातकाल जैसी कमियों को जनता के सामने रखकर  स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफलता हासिल की ।और उनकी 1977 में सरकार बनी और उन्हें प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया । लेकिन दो अन्य दावेदार यहां पर भी। प्रधानमंत्री के लिए मौजूद थे । जगजीवन राम और। चौधरी चरण सिंह ।लेकिन कांग्रेस पार्टी के। नेता जो कभी कांग्रेसी हुआ करते थे   “नेता जयप्रकाश नारायण” उन्होंने किंग मेकर की स्थिति का फायदा उठाते हुए मोरारजी देसाई को समर्थन दिया ।

23 मार्च  1977  को 81 साल के मोरारजी देसाई ने भारत के चौथे प्रधानमंत्री पद का दायित्व ग्रहण किया ।इनके कार्यकाल में जो 9 राज्य कांग्रेस शासित थे ठीक उन्हीं सरकारों को तोड़ दिया गया ,भंग कर दिया गया और दोबारा चुनाव कराने की घोषणा भी करवा दी।ये असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक कदम था ।जो बदले की भावना से लिया गया निर्णय था  वास्तव में  जनता पार्टी , कांग्रेस का और इंदिरा गांधी का देश से सफाया करने में कृत्संकल्प नजर आईं। लेकिन बुद्धिजीवियों द्वारा इस कृत्य को सराहना नहीं मिली ।

निधन
राजनीति से मोराजी देसाई ने 83 वर्ष की उम्र में सन्यास ले लिया और मुंबई में रहने लगे ।99 वर्ष की उम्र में 10 अप्रैल 1995 को उनका  निधन हो गया ।

मोरारजी देसाई की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें ।

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सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवनी -Biography of Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi , Early Life , Article

सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवनी -Biography of Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi , Early Life , Article

जन्म – 31 अक्टूबर  1875
मृत्यु – 15 दिसंबर1950

सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतंत्र भारत के पहले उप- प्रधानमंत्री बने ।उन्होंने राजनेता और अधिवक्ता के रूप में कार्य किया ।जनता ने उन्हें सरदार पटेल के नाम से जाना । वे भारतीय राजनीतिज्ञ थे ।सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय कांग्रेस के सीनियर नेता और भारतीय गणराज्य के संस्थापक पिता थे ।उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में मुख्य भूमिका निभाई और आज़ाद भारत में एकीकरण का मार्गदर्शन किया ।भारत और दूसरी देशों में उन्हें प्राय उर्दू,हिंदी और फारसी में सरदार कहा जाता था ।सरदार का मतलब होता हैं प्रमुख । राजनीतिक एकीकरण और भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान 1947 में उन्होंने गृह मंत्री के रूप में भारत को मार्गदर्शन दिया ।
182 मीटर ऊंची प्रतिमा गुजरात के केवड़िया में सरदार वल्लभ भाई पटेल की बनाई गई हैं जिसका अनावरण लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के 143 वीं जयंती पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया । एकीकरण के सूत्रधार बिस्मार्क से सरदार पटेल की अक्सर तुलना की जाती है कि ना तो सरदार पटेल  ने कभी मूल्यों से समझौता किया ना कभी बिस्मार्क ने । भारत जब आज़ाद हुआ तब 562 रियायतें मौजूद थीं सरदार पटेल ने इन्हे एक धागे में पिरोने और बनाने का काम किया जिसकी कल्पना करना भी उस समय कठिन था ।सरदार के अटल इराद्दों और दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते पर ही उन्हें लौह पुरुष कहा जाता है ।

प्रारंभिक जीवन

31 अक्टूबर 1875 को सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म गुजरात के नाडियाड में हुआ । उनकी माता का नाम लाड़बा पटेल और पिता का झावेर भाई पटेल था ।सरदार पटेल मां- बाप की चौथी संतान थे वे बहुत कुशाग्र बुद्धि जीवी थे

नरसिभाई ,विट्टलभाई ,सोमाभाई उनके अग्रज थे  ।सरदार पटेल की शुरू से  रुचि पढ़ने में अधिक थी ।मात्र सोलह वर्ष की उम्र में सरदार पटेल की शादी हो गई थी।उनकी पत्नी का नाम झवेरबा था ।उनके बच्चों में बेटे का नाम दाहया भाई पटेल और बेटी का नाम मणी बेन था । सरदार पटेल की  मुख्यत  शिक्षा स्वाध्याय से हुई बाद में विदेश जाकर लंदन से बैरिस्टर की शिक्षा ग्रहण की और वापिस भारत लौटे और अहमदाबाद में वकालत करते लगे ।भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया ।सबसे बड़ा योगदान खेड़ा संघर्ष 1918 में सरदार पटेल,गांधी जी और अन्य लोगों ने मिलकर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें भयंकर सूखे के चपेट में आए किसानों को अग्रेज़ सरकार से भारी कर में छूट की मांग करते हुए कर न देने पर प्रेरित किया ।इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी सरकार को झुकना पड़ा और उस साल करों में राहत दी गई ये सरदार पटेल और उनके साथियों की पहली सफलता थी ।सरदार पटेल की इस घटना के बाद गांधी उनसे बहुत प्रभावित हुए ।

गांधी से मुलाकात
1917 की बात है जब गुजरात में सूखा ,अकाल और इन्फ्लूएंजा जैसे बीमारी लोगों को ग्रसित कर रही थी ।तब पहली दफा सरदार पटेल की गांधी से मुलाकात हुई ।पटेल ने इस स्थिति में एक अस्थाई अस्पताल बनवाया और गांधी उनकी प्रशासकीय कार्यक्षमता से काफी प्रभावित भी हुए । इस अस्थाई अस्पताल में इन्फ्लूजा जैसे घातक बीमारी का इलाज यही हुआ। अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ नो टैक्स मूवमेंट चलता और किसानों का उस साल का कर माफ कराया। बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए मोर्चा संभाला।और 1928 में उस वक्त ही किसानों ने वल्लव भाई पटेल को “सरदार ” की उपाधि दी । गुजरात प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने।

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भारत बिखरने के लिए नहीं बना
1947 में भारत आज़ाद तो हुआ लेकिन बिखरा होने के साथ 562 रियायतें थीं। कुछ बहुत बड़ी फैली हुए तो कुछ छोटी दायरे में ज्यादातर राजा अपनी मनमानी के चलते विलय पर उतारू थे ।कुछ आज़ाद भी रहना चाहते थे मतलब ये देश की एकता के लिए मुसीबत थे ।जब सरदार पटेल ने इन्हे  समझौते पर बुलाया तो ये तैयार नहीं हुए तब पटेल ने सैन्य शक्ति का प्रयोग किए। देश vकी एकता और अखंडता का श्रेय सरदार पटेल को ही जाता है ।उनका कहना था कि मेरा भारत बिखरने के लिए नहीं बना हैं।
राजनीतिक सफर
आज़ाद भारत के गृहमंत्री के तौर पर पहले व्यक्ति थे ।सरदार पटेल ने आई सी एस का (भारतीय नागरिक सेवाएं) भारतीयकरण करके इन्हें आई .ए .एस (भारतीय  प्रशासनिक सेवाएं) बनाया। वर्ष 1991 में मरणोपरांत सरदार पटेल को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार *भारत रत्न* से नवाजा गया उनके पौत्र विपिनभाई पटेल द्वारा ये अवॉर्ड स्वीकार किया गया ।अहमदाबाद। के हवाई अड्डे का नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल के सम्मान में उनके नामकरण करके सरदार वल्लभ भाई पटेल अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा अहमदाबाद रखा गया है।

अहमदाबाद के शाहीन बाग में सरदार पटेल की यादों को ताजा रखने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल मेमोरियल सोसायटी में सरदार पटेल का 3D संग्रहालय तैयार किया गया है।


सरदार पटेल अपने अंग्रेज़ी पहनावे और उच्च स्तरीय तौर तरीकों और चुस्त, फैशनपरस्त गुजरात क्लब में ब्रिज के चैंपियन होते हुए काफी विख्यात थे ।

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लेकिन सरदार पटेल ने  1920 के असहयोग आन्दोलन में स्वदेशी धोती कुर्ता,चप्पल और खादी अपनाए और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते विदेशी कपड़ों की होली जलाई ।

कमजोर मुकदमों को सटीकता के साथ प्रस्तुत करके सरदार पटेल ने  पुलिस के गवाहों और अंग्रेज़ न्यायधीशों को चुनौती देकर विशेष जगह बनाई ।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सरदार पटेल कई मरतबा जेल के अंदर बाहर हुए ।इतिहासकार हमेशा से जिस चीज के बारे। में जानने के लिए उत्साहित रहते हैं वो जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल की आपसी तालमेल और सम्बन्धों को लेकर और उनके बीच की प्रतिस्पर्धा । लाहौर अधिवेशन 1929 में सरदार पटेल ही महत्मा गांधी के बाद दूसरे सबसे मजबूत और प्रबल दावेदार थे ।माना जाता है कि सरदार पटेल की मुस्लिमो के प्रति हठधर्मिता की वजह से गांधी ने उनका नाम वापिस ले लिया ।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर 1945-46 में सरदार पटेल भी मुख्य उम्मीदवार थे ।लेकिन गांधी जी ने नेहरू प्रेम में उन्हें इस दावेदारी से दूर रखा ।

बहुत से इतिहासकार मानते हैं।यदि प्रधानमंत्री पद पर पहले व्यक्ति सरदार पटेल होते तो भारत को चीन और पाकिस्तान से युद्ध में पूर्ण रूप से सफलता मिली होती ।
गांधी जी के प्रति श्रद्धा

गांधी के लिए सरदार पटेल की अटूट श्रद्धा थी निजी रूप से गांधी की हत्या से कुछ समय पहले बात करने वाले पटेल अंतिम व्यक्ति थे । गृह मंत्री होने के नाते उन्होंने सुरक्षा में चूक को अपनी गलती माना था।ठीक गांधी की हत्या के दो महीने बाद सरदार पटेल की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थीं।

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स्टैचू ऑफ यूनिटी

2018 में तैयार हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा को प्रधानमंत्री मोदी जी। ने उनके 137 वें  जयंती पर 31 अक्टूबर 2018 को राष्ट्र को समर्पित किया ।इस प्रतिमा का बनने का समय पांच वर्ष और खर्च लगभग 3000 करोड़ रुपए में तैयार हुई हैं।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

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राजीव गांधी की जीवनी, परिचय,हिंदी में – Rajiv Gandhi Biography, Early Life,in Hindi

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जन्म -20 अगस्त1944, मुंबई , महाराष्ट्र
मृत्यु- 21 मई 1991

उपलब्धियां

प्रारंभिक जीवन
राजीव गांधी का जन्म मुंबई ,महाराष्ट्र में 20 अगस्त 1944 को भारत के विकसित राजनैतिक परिवार में हुआ ।भारत की आज़ादी की लड़ाई में राजीव गांधी के दादा जवाहर लाल नेहरू की मुख्य भूमिका रही और बाद में आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने ।राजीव गांधी के माता पिता दोनों अलग रहते थे इस कारण उनका रहन सहन उनके दादा के घर पर हुआ। जहां उनकी मां इंदिरा गांधी उनके साथ रहती थी । प्रारंभिक शिक्षा राजीव की चर्चित स्कूल दून से पूरी हुई और उच्च शिक्षा के लिए लंदन यूनिवर्सिटी ट्रिनिटी कॉलेज और कैम्ब्रिज से पढ़ाई की।

पढ़ाई के दौरान राजीव गांधी की मुलाकात एंटोनिया माइनो से हुई और बाद में मुलाकात प्रेम में बदल गई और सन 1969 में दोनों ने शादी कर ली ।शादी के बाद उन्होंने अपनी धर्म पत्नी एंटोनिया माइनो का नाम बदल कर सोनिया गांधी रखा ।राजीव गांधी के दो बच्चे हुए प्रियंका और राहुल ।सोनिया गांधी वर्तमान समय (2020) में भारतीय कांग्रेस की अध्यक्ष हैं।और राहुल गांधी सांसद के रूप में राजनीति में कार्यरत हैं।

कैरियर
राजीव गांधी भारत लौटने के बाद कमर्शियल एयर लाइन में पायलट बने । दूसरी तरफ उनके छोटे भाई संजय राजनीति में सक्रिय हो चुके थे ।और इंदिरा गांधी के भरोसेमंद प्रतिनिधि बन चुके थे ।संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद 1980 में बिना इच्छा व्यक्त किए राजीव गांधी ने मां के कहने पर राजनीति में कदम रखा ।

राजीव गांधी ने अपने भाई संजय के पूर्व संसदीय सीट अमेठी से अपना लोकसभा चुनाव जीता ।और बहुत जल्द कांग्रेस का महासचिव पद संभाला ।1984  में इंदिरा गांधी के दो अंगरक्षक द्वारा उनको गोली से मार दिया ।उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया ।आम चुनावों में 1984 में आवाहन किया और सहानुभूति की लहर पर अपनी पार्टी कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल करवाई।निचले सदन की 80 प्रतिशत सीट जीत कर कांग्रेस  ने स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ी जीत दर्ज की ।

शुरुआती दिनों में राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद के रूप में काफी लोकप्रिय थे ।अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री पद में थोड़ी गतिशीलता लेकर आए । भारत में कंप्यूटर और टेली कम्युनिकेशन की शुरुआत का श्रेय उन्हें ही जाता हैं। इंदिरा गांधी के समाजवादी राजनीतिक उसूलों से हटकर अलग दिशा में देश का मार्गदर्शन किया । उन्होंने अर्थिंक और वैज्ञानिक सहयोग का विस्तार करके अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों में  सुधार किया ।उन्होंने टेक्नोलॉजी, विज्ञान , कंप्यूटर,मास मीडिया , संबधित उद्योगों पर ध्यान दिया और विशेष रूप से टेक्नोलॉजी पर आधारित कंप्यूटर ,बैंक, एयरलाइंस,रक्षा अनुसंधान और दूरसंचार पर आयात किया,शुल्क और करों को कम किया ।उन्होंने प्रशासन को नौकरशाही घपलेबाजों  से बचाने और दफ्तरशाही शासन को कम करने की दिशा में काम किया ।उच्च शिक्षा के कार्यक्रमों के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए राजीव गांधी ने भारत भर में 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की।

पंजाब में अलगाववादी ताकतों के खिलाफ राजीव गांधी ने व्यपाक पुलिस और सेना अभियान चलाया । एल टी टी ई विद्रोहियों और श्रीलंका के बीच शांति वार्ता के प्रयासों का उल्टा असर हुआ और कांग्रेस सरकार को एक बड़ी असफलता का सामना करना पड़ा । एल टी टी ई आंतकवादीओं और भारतीय सैनिकों के बीच अविश्वास और संघर्ष एक खुली जंग के रूप में बदल गया । सैंकड़ों हज़ारों सैनिक मारे गए और भारतीय सेना को श्रीलंका से राजीव सरकार में वापिस बुला लिया ।ये फैसला राजीव सरकार का एक कूटनीतिज्ञ विफलता के रूप में सामने आया ।

राजनीति के दौर में हर एक नेता भ्रष्टचार ख़तम करने की बात करता ही करता है।ठीक राजीव गांधी ने भी ये वादा जनता से किया था हालांकि उनकी पार्टी पर खुद भ्रष्टचार धांधली के कई आरोप लगे । सबसे ज्यादा चर्चित घोटाला स्वीडिश बोफोर्स हथियार कंपनी द्वारा कथित भुगतान से लिंक्ड *बोफोर्स तोप घोटाला * था । घोटाले के मामले में उनकी लोकप्रियता बहुत तेजी से जनता में कम हुए और 1989 के आम चुनावों में हार मिली ।उस समय की गठबंधन के साथ सत्ता में आई सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और 1991 के लोकसभा चुनाव करवाएं गए ।तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में 21 मई 1991 चुनाव प्रचार के दौरान एल टी टी ई के आंतकवादी हमलावरों ने राजीव गांधी की हत्या कर दी।

आरोप और आलोचना
(1)64 करोड़ बोफोर्स घोटाले का आरोप जिसके बाद उनको प्रधानमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा ।
(2) ढाई बिलियन स्विस फ्रैंक काले धन का स्विस बैंकों में रखने का आरोप schwieizer illustrierte नामक पत्रिका ने लगाया लेकिन साबित नहीं हो पाया ।
(3) वारेन एंडरसन को रिश्वत लेकर देश से फरार करने का आरोप लगाया जो भोपाल गैस काण्ड का आरोपी था।
(4)टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार सोवियत संघ “के जी बी ” गुप्तचर संस्था ने राजीव को धन मुहैया कराया था ।
(5) सिक्खों के संदर्भ में एक वक्तव्य देने की कड़ी आलोचना हुई थी “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती तो हिलती है।”
ये जानकारी विकिपीडिया से ली गई हैं।

सी बी आई के संदर्भ में आलोचना
सी बी आई कि जिस तरह से भूमिका रही हैं उस संदर्भ में राजनैतिक दलों, समाजिक कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों ,और लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर आलोचना की गई है।
(1)प्रथम सूचना रिपोर्ट में देरी
(2)अनुरोध पत्र में डील
(3)दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध 2004 में अपील न करना ।
(4)कात्रोची के प्रत्यर्पण के लिए अर्जेंटीना से कमजोर केस बनाना ।
(5)निचली अदालतों के फैसले पर कोई टिप्पणी (अपील) न करना
(6)इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस को रिटर्न लेना।
(7)कात्रोची के खिलाफ मुकदमे को वापस लेना ।

राजीव गांधी की वीडियो में बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

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अटल बिहारी वाजपेई की जीवनी, परिचय,हिंदी -Biography of Atal Bihari Vajpayee and Early Life in Hindi

अटल बिहारी वाजपेई की जीवनी, परिचय,हिंदी -Biography of Atal Bihari Vajpayee and Early Life in Hindi

पुरस्कार और सम्मान

(1)1992 में देश की अभूतपूर्व सेवाओं के लिए “पद्म विभूषण ” सम्मान ।
(2)1993 ,कानपुर यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि का सम्मान।
(3)1994 , लोकमान्य तिलक अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
(4)1994 ,पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से नवाजा गया।
(5)1994, सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान।
(6)2015,देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार”भारत रत्न” से नवाजा ।
(7)2015,बांग्लादेश द्वारा “लिब्रेशन वार अवॉर्ड ” दिया गया ।

अटल बिहारी वाजपेई जीवन भर राजनीति में सक्रिय रहे । पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद एकमात्र ऐसे नेता रहे जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला ।वे भारत के सबसे प्रेरक और सम्माननीय राजनीतिज्ञो में से एक रहे ।अटल जी ने विभिन्न परिषदों और संगठनों के मेंबर के तौर पर अपनी भूमिका निभाते हुए सेवाएं दी।अटल जी प्रखर वक्ता और प्रभावशाली कवि थे ।एक बड़े नेता के तौर पर वे अपनी लोकतांत्रिक, साफ़ छवि और उदार विचारों के लिए जाने गए।अटल जी को 2015 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान”भारत रत्न” से नवाजा गया ।

प्रारंभिक जीवन

25 दिसंबर 1924 को अटलजी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ ।वे सात भाई – बहन थे उनकी माता का नाम कृष्णा देवी और पिता का कृष्ण बिहारी था ।उनके पिता विद्वान और स्कूल शिक्षक थे अटल जी अपनी स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद लक्ष्मीबाई कॉलेज  और डी. ए.वी  कॉलेज कानपुर आ गए ।यहां से इन्होंने इकोनॉमिक्स सबजेक्ट में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। उन्होंने लखनऊ से आगे की पढ़ाई के लिए आवेदन भरा लेकिन पढ़ाई जारी नहीं कर पाए ।बाद में इन्होंने बतौर संपादक आरएसएस द्वारा प्रकाशित पत्रिका में नौकरी की । हालांकि अटल जी ताउम्र अविवाहित रहे ।उन्होंने बी एन कौल की दो बेटियों नंदिता और नमिता को गोद लिया ।

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करियर

अटल जी ने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपनी  राजनैतिक यात्रा का शुभारंभ किया ।भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लेने पर 1942 में अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिए गए।श्यामा प्रसाद मुखर्जी से पहली मुलाकात उनकी इसी दौरान हुए ।जो बी जे एस के नेता यानी भारतीय जनसंघ के नेता थे।अटल जी ने उनके राजनैतिक एजेंडे में सहयोग दिया । स्वास्थ्य संबंधी समस्या के चलते मुखर्जी का निधन हो  गया ।बाद में बी जे एस का कार्यकाल अटल जी के कंधों पर आ गया और इस संगठन के एजेंडे और विचारों को आगे बढ़ाया ।लोकसभा चुनावों में बलरामपुर सीट से1954 में संसद सदस्य निर्वाचित हुए । विस्तृत नजरिए और राजनीतिक जानकारी ने उन्हें छोटी उम्र में राजनीति जगत में सम्मान और पहचान दिलाने में मदद की। जब मोरारजी देसाई की सरकार 1977 में बनी तो अटल जी को विदेश मंत्री का पद दिया गया । दो साल बाद अटल जी ने चीन की यात्रा की ।यात्रा का मकसद चीन सम्बन्धों पर चर्चा करना था।1971 में भारत- पाक के युद्ध के कारण प्रभावित व्यापारिक संबंधों को सुधारने के लिए पाकिस्तान की भी यात्रा की। आरएसएस पर जब जनता पार्टी ने हमला किया तब अटल जी ने 1979 में मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया ।

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अटल जी व आरएसएस से आए लाल कृष्ण आडवाणी तथा बीजेएस और भैरों सिंह शेखावत व अन्य साथियों ने सन् 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी । पहले पांच साल “स्थापना के” अटल जी खुद बीजेपी के अध्यक्ष रहे ।।
भारत में प्रधानमंत्री के तौर पर
लोकसभा चुनाव के बाद सन 1996 में बीजेपी को सत्ता में आने का मौका मिला और अटल जी प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।लेकिन कुछ दिनों में ही बहुमत सिद्ध न कर पाने पर सरकार गिर गई और अटल जी को मात्र 13 दिनों के अंदर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा ।
एक बार फिर बीजेपी 1998 में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने पर सरकार बनाने में कामयाब रही।लेकिन इस बार सरकार तेरह महीनों तक चल सकी।क्यूंकि अपना समर्थन वापिस लेते हुए आॅल इंडिया द्रविड़ मुनेन काजगम पार्टी ने सरकार गिरा दी।अटल जी के योगदान और नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने  राजस्थान के पोखरण में मई 1998 में परमाणु परीक्षण कराए।
एनडीए(नेशनल डेमक्रेटिक एलायंस ) को 1999 लोकसभा चुनाव में सरकार बनाने की सफलता प्राप्त हुई और अटल जी एक बार फिर प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।इस बार पूरे पांच साल पूरे करने पर एनडीए पार्टी  पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी ।अटल जी ने निजी   क्षेत्र और आर्थिक सुधार के लिए सहयोगी दलों के मजबूत समर्थन से कई योजनाएं शुरू की। औद्योगिक क्षेत्र में अटल जी ने राज्यों के दख़ल को सीमित करने का प्रयास किया ।सूचना तकनीकी और विदेशी निवेश की दिशा में अटल जी ने शोध को बढ़ावा दिया ।भारत की अर्थव्यवस्था पर अटल जी ने नई नीतियों और विचारों के परिणाम स्वरूप त्वरित विकास हासिल किया । यू एस ए और पाक के साथ दोस्ताना व्यवहार कायम करके अपनी सरकार में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत किया ।हालांकि विदेश नीतियों पर अटल जी की सरकार ज्यादा बदलाव नहीं ला सकी लेकिन फिर भी इन नीतियों की सराहना हुई।
एनडीए के पूरे पांच साल होने के बाद पूरे आत्मविश्वास के साथ अटल जी के नेतृत्व में लोकसभा चुनावों में बीजेपी एक बार फिर चुनाव में उतरी लेकिन इस बार यूपीए (कांग्रेस) ने सफलापूर्वक अपनी सरकार बनाई ।
और इसके साथ ही अटल जी ने सक्रिय राजनीति से दिसंबर 2005 में संन्यास लेने की घोषणा कर दी।
व्यक्तिगत जीवन
अटलजी समस्त जीवन में अविवाहित रहे और उन्होंने बी एन कौल की बेटी नमिता भट्टाचार्य को गोद लिया था ।

मृत्यु
अटल जी एक बार 2009 में दिल का दौरा पड़ने से जूझ चुके थे जिसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता रहा । ग्यारह जून 2018 को उन्हें एम्स (अखिल भारतीय आयु्विज्ञान संस्थान) में भर्ती किया गया था । सोलह अगस्त 2018 को अटलजी परलोक सिधार गए । सत्रह अगस्त को उनकी मुंह बोली बेटी नमिता कौल ने उन्हें मुखाग्नि दी।राजघाट के नजदीक शांति वन में स्मृति स्थल में उनकी समाधि बनाई गई हैं।

जीवन घटनाक्रम (टाइमलाइन)
1924 * अटल जी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ ।
1942 *भारत छोड़ो आन्दोलन में भागीदारी ।
1957 *लोकसभा सीट के लिए चुने गए ।
1980 *बीजेपी की स्थापना ।
1992 *पद्म विभूषण सम्मान।
1996 * प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त।
1998 *दूसरी बार प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत।
1999 *तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने।
2005 *राजनीति से सन्यास ।
2015 *भारत रत्न से सम्मानित।
2108 *11 जून ,2018 , मृत्यु

अटल जी का कविता सग्रह से दिखाई गई एक कविता

अरूण कुमार
Source: Kavita sangrah

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डॉ. जाकिर हुसैन जीवन परिचय

जन्म: 8 फरवरी, 1897, हैदराबाद, तेलन्गाना, भारत
मृत्यु: 3 मई, 1969, दिल्ली, भारत
कार्य: भारत के तीसरे राष्ट्रपति

डॉ. जाकिर हुसैन जीवन परिचय

डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म तेलन्गाना के हैदराबाद में 8 फरवरी, 1897 में हुआ उनके जन्म के बाद उनका परिवार उत्तर प्रदेश के फरुक्खाबाद जिले के कायमगंज में बस गया था उनका जन्म भारत में हुआ था, लेकिन उनके परिवार के पुराने इतिहास को देखा जाए तो ये वर्तमान पश्तून जनजाति वाले पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों से सम्बन्ध रखते थे. यह भी कहा जाता है कि उनके पूर्वज अठारहवीं शताब्दी के दौरान वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आकर बस गए थे।जब वह केवल दस वर्ष के थे तो उनके पिता चल बसे और चौदह वर्ष की बाल उम्र में उनकी माँ का निधन हो गया था। युवा जाकिर ने इटावा में इस्लामिया हाई स्कूल से अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा पूरी की। बाद में उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ में एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज (अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है) में दाखिला लिया। यहीं से उन्होंने एक युवा सुधारवादी राजनेता के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की।
डॉ. जाकिर हुसैन 13 मई, 1967 से 3 मई, 1969 तक स्वतंत्र भारत के तीसरे राष्ट्रपति रहे। डॉ. जाकिर हुसैन भारत में आधुनिक शिक्षा के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे और उन्होंने अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय को स्थापित किया। उनके द्वारा स्थापित राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय आजकल जामिया मिलिया इस्लामिया के नाम से एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रूप में नई दिल्ली में मौजूद है, जहाँ से हजारों छात्र प्रत्येक वर्ष अनेक विषयों में शिक्षा ग्रहण करते हैं।डॉ. जाकिर हुसैन ने बिहार के राज्यपाल के रूप में भी सेवा की थी और इसके बाद वे अपना राजनीतिक कैरियर समाप्त होने से पहले वे देश के उपराष्ट्रपति रहे तथा बाद में वे भारत के तीसरे राष्ट्रपति भी बने।
डॉ जाकिर हुसैन को अलीगढ़ के एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज में अध्ययन के वर्षों के दौरान से ही एक छात्र नेता के रूप में पहचान मिली। राजनीति के साथ-साथ उनकी दिलचस्पी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी थी। अपनी औपचारिक उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वे 29 अक्टूबर, 1920 को उन्होंने कुछ छात्रों और शिक्षकों के साथ मिलकर अलीगढ़ में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की (वर्ष 1925 में यह यूनिवर्सिटी करोल बाग, नई दिल्ली में स्थानांतरित हो गयी। दस वर्षों के बाद यह फिर से जामिया नगर, नई दिल्ली में स्थायी रूप से स्थानांतरित कर दी गयी और इसका नाम जामिया मिलिया इस्लामिया रखा गया था)। इस समय उनकी मात्र 23 साल थी।

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डॉ. जाकिर हुसैन उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए थे परन्तु जल्द ही वे भारत लौट आये। वापस आकर उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया को अपना शैक्षणिक और प्रशासनिक नेतृत्व प्रदान किया। विश्वविद्यालय वर्ष 1927 में बंद होने के कगार पर पहुँच था, लेकिन डॉ. जाकिर हुसैन के प्रयासों की वजह यह शैक्षिक संस्थान अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने में कामयाब रहा था।उन्होंने लगातार अपना समर्थन देना जारी रखा, इस प्रकार उन्होंने 21 वर्षों तक संस्था को अपना शैक्षिक और प्रबंधकीय नेतृत्व प्रदान किया। उनके प्रयासों की वजह से इस विश्वविद्यालय ने ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के लिए संघर्ष में योगदान दिया।एक शिक्षक के रूप में डॉ. जाकिर हुसैन ने महात्मा गांधी और हाकिम अजमल खान के आदर्शों को प्रचारित किया। उन्होंने वर्ष 1930 के दशक के मध्य तक देश के कई शैक्षिक सुधार आंदोलन में एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया।

डॉ जाकिर हुसैन की गहरी रुचि और समर्पण, राजनीति की तुलना में शिक्षा के प्रति अधिक था, जिसका स्पष्ट प्रमाण उनका अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री के लिए जर्मनी जाना था। जब वे बर्लिन विश्वविद्यालय में थे तो उन्होंने प्रसिद्ध उर्दू शायर मिर्जा खान गालिब के कुछ अच्छे शायरियों का संकलन किया था। जाकिर हुसैन का विचार था कि शिक्षा का मकसद अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई के दौरान भारत की मदद के लिए मुख्य उपकरण के रूप उपयोग करना था। वास्तव में जाकिर हुसैन का भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लक्ष्य के प्रति इतना समर्पण था कि वे अपने प्रबल राजनीतिक विरोधी मोहम्मद अली जिन्ना का भी ध्यान अपनी तरफ खींचने में सफल रहे।
डॉ. जाकिर हुसैन स्वतंत्र भारत में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति (पहले इसे एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था) चुने गए। वाइस चांसलर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. जाकिर हुसैन ने पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश बनाने की मांग के समर्थन में इस संस्था के अन्दर कार्यरत कई शिक्षकों को ऐसा करने से रोकने में सक्षम हुए। डॉ. जाकिर हुसैन को वर्ष 1954 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। डॉ. जाकिर हुसैन को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में अपने कार्यकाल के अंत में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था।इस प्रकार वे वर्ष 1956 में भारतीय संसद के सदस्य बन गये। वे केवल एक वर्ष के लिए बिहार के राज्यपाल बनाए, पर बाद में वे पांच वर्ष (1957 से 1962) तक इस पद पर बने रहे।

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जाकिर हुसैन को उनके कार्यों को देखते हुए वर्ष 1963 में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. दिल्ली, कोलकाता, अलीगढ़, इलाहाबाद और काहिरा विश्वविद्यालयों ने उन्हें उन्होंने डि-लिट् (मानद) उपाधि से सम्मानित किया था। राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के अंत के साथ ही डॉ. जाकिर हुसैन पांच वर्ष की अवधि के लिए देश के दूसरे उप-राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने 13 मई, 1967 को राष्ट्रपति पद ग्रहण किया। इस प्रकार वे भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बने । वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद राष्ट्रपति पद पर पहुचने वाले तीसरे राजनीतिज्ञ थे।

भारत के राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के दो साल के बाद 3 मई, 1969 को डॉ. जाकिर हुसैन का निधन हो गया। वे पहले राष्ट्रपति थे जिनका निधन कार्यकाल के दौरान ही हुआ। उन्हें नई दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया (केन्द्रीय विश्वविद्यालय ) के परिसर में दफनाया गया है।

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