राम जेठमलानी जीवनी हिंदी में – Ram Jethmalani jeevni , biography in Hindi

राम जेठमलानी जीवनी हिंदी में – Ram Jethmalani jeevni , biography in Hindi

जन्म – 14 सितंबर 1923 , शिकारपुर ,सिंध ,(वर्तमान पाकिस्तान में )
मृत्यु – 8 सितंबर 2019
कार्यक्षेत्र – कानूनविद , राजनीतिज्ञ, पूर्व केंद्रीय मंत्री

राम भूलचंद जेठमलानी एक जाने माने राजनीतिज्ञ और प्रसिध्द भारतीय वकील थे ।वे बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व कानून मंत्री रह चुके थे । विवादास्पद मामलों के मुकदमें की पैरवी करने और उच्च प्रोफ़ाइल के कारण अपने वकालत कैरियर के समय कई बार राम जेठमलानी को कड़ी आलोचना का सामना भी करना पड़ा था ।ऐसा माना जाता है। कि वे कुछ मामलों पर निशुल्क पैरवी करते थे और कुछ मामलों में भारतीय उच्चतम न्यायालय के सबसे महंगे वकीलों में से एक रहे ।
अपने जीवन शैली के कारण और मुकदमों के साथ साथ वक्तव्यों के कारण भी कई बार सुर्खियों में रहते थे।उन्होंने कानून की डिग्री मात्र 17 साल की उम्र में प्राप्त कर ली । और अगले वर्ष अठारह साल की उम्र में प्रैक्टिस के लिए जाने लगे ।(हालांकि उस समय वकालत की प्रैक्टिस करने के लिए इक्कीस साल अनिवार्य थे । लेकिन 18 साल के जेठमलानी के लिए एक विशेष प्रस्ताव पास करके प्रैक्टिस करने की इजाज़त दे दी गई ।)
राम जेठमलानी भारत के राज्यसभा और लोकसभा के मेंबर रह चुके हैं और अटल बिहारी वाजपई की सरकार के समय शहरी विकास मंत्री और कानून मंत्री भी रह चुके हैं।

प्रारंभिक जीवन

14 सितंबर 1923 को राम जेठमलानी का जन्म सिंध के शिकारपुर (वर्तमान पाकिस्तान ) में हुआ । उनके फादर का नाम भुलचंद गुरूमुखदास जेठमलानी और मदर का नाम पार्वती भूलचंद था ।राम जेठमलानी की बाल शिक्षा स्थानीय स्कूल में हुई ।अपनी होशियारी और बुद्धि के कारण उन्हें दो बार नियमित क्लास से अगली क्लास में प्रोन्नत किया गया जिसके चलते मात्र तेरह साल की आयु में राम जेठमलानी ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली ।
कराची के एस सी साहनी लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री 17 साल की उम्र में प्राप्त करके अगले साल प्रैक्टिस में उतरे लेकिन सरकार द्वारा निर्धारित प्रैक्टिस करने के लिए 21 साल की उम्र निर्धारित थी लेकिन 18 साल के जेठमलानी के लिए विशेष छूट देकर प्रैक्टिस करने की अनुमति दी गई ।उसके पश्चात उन्होंने एलएलएम की डिग्री प्राप्त की ।
राम जेठमलानी की शादी 18 साल की उम्र में दुर्गा से कर दी गई ।ठीक 1947 के देश विभाजन से कुछ समय पहले उन्होंने रत्न साहनी जो पेशे से वकील थी उनसे भी शादी रचाई ।दोनों पत्नियों के चार बच्चे हुए – शोभा , जनक,रानी,महेश।

करियर
करियर की शुरुआत राम जेठमलानी ने सिंध में एक प्रोफ़ेसर के तौर पर की ।उन्होंने अपने मित्र ए के ब्रोही (जो पाकिस्तान के कानून मंत्री बने ) के साथ मिलकर एक लॉ फर्म की स्थापना कराची में की । कराची में विभाजन के बाद जब 1948 में दंगे भड़के तो ब्रोहि ने ही उन्हें पाकिस्तान छोड़कर भारत लौटने की सलाह दी ।
उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में 1953 में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया ।यहां के छात्रों को स्नातक व स्नातकोत्तर के स्तर पर पढ़ाने लगे । उन्होंने वायने स्टेट यूनिवर्सिटी (अमेरिका के डेट्रॉयट) में इंटरनेशनल लॉ भी पढ़ाया।
बे के एम नानावती और महाराष्ट्र राज्य के चर्चित मुकदमें के दौरान सन् 1959 में चर्चा में आए। जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ (जो भारतीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे )भी इस मुकदमें में उनके साथ थे ।
तस्करों के बचाव में राम जेठमलानी 1960 के दशक में अदालत में उनके साथ खड़े दिखाई दिए इसके बाद “तस्करों के वकील” लोगों के द्वारा कहां जाना लगा ।उन्होंने बिना परवाह किए आलोचकों के लिए कहा कि मैं तो सिर्फ एक वकील का फ़र्ज़ अदा कर रहा हूं ।वे “बार काउंसिल ऑफ इंडिया “ के चार बार अध्यक्ष रह चुके हैं।वे इंटरनेशनल बार काउंसिल के भी सदस्य रह चुके हैं।
राजनीतिक करियर
उल्लास नगर क्षेत्र से पहली बार 1971 में लोकसभा चुनाव के लिए लड़े ,लेकिन सफलता नहीं मिली ।1975-77 )देश में आपातकाल के समय राम जेठमलानी बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष थे ।उस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री की कड़ी आलोचना करने पर उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हुआ जिसके परिणास्वरूप उन्हें देश छोड़कर कनाडा जाना पड़ा ।बाद में आपातकाल ख़तम होने पर वापिस लौट आए।

1977 के लोकसभा चुनाव में आपातकाल के बाद, पहली बार एच आर गोखले को बॉम्बे लोकसभा क्षेत्र से असफल करके लोकसभा में प्रवेश किया ।परंतु इस बार भी कानून मंत्री नहीं बन पाए । क्योंकि उनकी जीवन शैली से मोरारजी देसाई खुश नहीं थे ।इसके पश्चात एक मर्तबा 1980 में फिर लोकसभा चुनाव जीता ।सुनील दत्त के विरुद्ध 1985 चुनाव में हार गए ।

राज्य सभा के लिए 1988 में चुना गया और वाजपेई सरकार में 1996 में न्याय और कंपनी मामलों व कानून मंत्री के पद को संभाला ।एक बार फिर 1999 में कानून मंत्री बनाया गया ।लेकिन तत्कालीन न्यायधीश ए एस आंनद (सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश ) पर उनके दिए गए विवादास्पद टिप्पणी करने पर अटल जी ने उन्हें अपनी सरकार से मंत्री पद छोड़ने को कहा।
एक बार फिर लोकसभा चुनाव के लिए लखनऊ में अटल बिहारी वाजपई के विरुद्ध खड़े होकर करारी हार का सामना करना पड़ा।
भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान से उन्हें 2010 में एक बार फिर राज्य सभा का सदस्य बनाया । “भारतीय जनता पार्टी “ के नेताओं पर (2012 ) में यूपीए सरकार के दौरान हुए घोटाले पर चुप्पी साधने का उलाहना देते हुए तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष नितिन गड़करी को पत्र लिखा जिसके पश्चात 6 साल के लिए मई 2013 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया ।

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निधन
8 सितंबर 2019 को उनके खराब स्वास्थ्य के चलते नई दिल्ली में उनके घर पर उनका निधन हुआ ।उनके बेटे महेश के अनुसार वे कुछ दिन ,महीनों से ठीक नहीं थे ।

राम जेठमलानी की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें ।

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डॉ राम मनोहर लोहिया का जीवन परिचय ।

डॉ राम मनोहर लोहिया जीवन परिचय -Ram Manohar Lohia biography in Hindi

डॉ राम मनोहर लोहिया जीवन परिचय -Ram Manohar Lohia biography in Hindi


राम मनोहर लोहिया
राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी
जन्म -23 मार्च 1910, अकबरपुर, फैज़ाबाद
निधन – 12 अक्टूबर 1967 , नई दिल्ली
कार्य क्षेत्र -स्वतंत्रता सेनानी,राजनेता

राम मनोहर लोहिया एक प्रखर समाजवादी और स्वतंत्रता सेनानी और सम्मानित राजनीतिज्ञ थे ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी दिलाने में अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अतुल्य योगदान दिया ।उनमें से एक सपूत राम मनोहर लोहिया भी रहे ।वे एक आशावादी और बेहद साहसी व्यक्तितव के कर्मठ व्यक्ति थे ।उनका जीवन चरित्र प्रगतिशील विचारधारा रखने वाले जनमानस के लिए सदैव प्रेरणादायक बना रहा ।
आज़ादी की लड़ाई में और सत्य के पथ पर मनोहर अटूट विश्वास के साथ लड़ते रहे । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत की राजनीति में बहुत नेता आए जिन्होंने अपने अटूट विश्वास के दम पर राजनीति का रुख बदल कर रख दिया ।राम मनोहर लोहिया भी उन्हीं में से एक थे ।
अपनी देशभक्ति और समाजवादी विचारधारा को बुलंद आवाज़ के साथ जनता के बीच पहुंचाने के लिए जाने गए ।और इन्हीं गुणों के कारण अपने समर्थकों और विरोधी दलों में भी खूब वाहवाही बटोरी ।

राम मनोहर लोहिया का प्रारंभिक जीवन

23 मार्च 1910 को उतर प्रदेश के अकबरपुर में राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ । उनके पिता का नाम श्रीहीरालाल था पेशे से एक शिक्षक व दिल से सच्चे राष्ट्रभक्त थे ।मनोहर की माता भी अध्यापिका थी ।मनोहर जब बहुत छोटे थे तब उनकी मां का निधन हो गया था ।
अपने पिता के साथ युवा मनोहर को अलग अलग रैलियों और विरोध प्रदर्शन व सभाओं के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हिसा लेने की प्ररेणा मिली ।
उनके जीवन में नया मोड़ लाना वाला समय तब था जब मनोहर के पिता उन्हें अपने साथ महात्मा गांधी से मिलाने के लिए साथ लेकर गए ।मनोहर के पिता महात्मा गांधी के बहुत बढ़े अनुयाई थे ।मनोहर महात्मा गांधी के सोच और विचारों से काफी प्रेरित हुए ।तभी से जीवनभर गांधी के आदर्शों का पालन और समर्थन करते रहे ।
पंडित जवाहलाल नेहरू से पहली बार 1921 में मिले।और उनके साथ कुछ सालों तक उनकी देखरेख में काम किया ।लेकिन कुछ राजनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों का आपसी टकराव हुआ और दूरियां बना ली।
1928 में किशोर लोहिया ने मात्र 18 साल की उम्र में ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित “साइमन कमीशन “ का विरोध किया और विरोध प्रदर्शन का आयोजन भी खुद संभाला ।

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राम मनोहर लोहिया प्रथम श्रेणी से मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद इंटरमीडिट में दाखिला हिंदी विश्वविदयालय बनारस में लिया ।उसके बाद अपनी स्नातक की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय से पूरी की और पी. एच. डी. शोध के लिए विश्वविद्यालय बर्लिन , जर्मनी चले गए ।जहां से 1932 में पीएचडी पूरी की । उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक परफॉर्मेंस के लिए उन्हें वितीय सहायता भी मिली ।

राम मनोहर लोहिया की विचारधारा

भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में मनोहर ने अंग्रेज़ी से अधिक हिंदी को प्राथमिकता दी।उनका मानना था कि “अंग्रेज़ी” शिक्षित और अशिक्षित समाज के बीच दूरी पैदा करता है।उनका कहना था कि हिंदी के बोलचाल से नए राष्ट्र के निर्माण से जुड़े विचारों को बढ़ावा मिलेगा ।
वे जातिवाद और भेदभाव के घोर विरोधी थे ।उनका जाति व्यवस्था पर सुझाव था कि “रोटी और बेटी “ के माध्यम से जातपात को समाप्त किया का सकता हैं।
उनका कहना था कि जाति भेदभाव दूर हो और सभी लोग मिलजुलकर रहे और खाना खाएं और उच्च और निम्न वर्ग का विवाह रिवाज़ सरल रूप से बिना किसी ऊंच नीच के संपन्न हो ।

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इस प्रकार “यूनाइटेड सोसिलिस्ट पार्टी “ में उच्च पदों पर किए गए चुनाव के टिकट निम्न जाति के उम्मीदवार को देकर भी उन्हें प्रोत्साहन और बढ़ावा दिया ।वे बेहतर स्कूलों की स्थापना और समान शिक्षा के अवसर पर भी अपने विचार रखते थे ।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
राम मनोहर लोहिया बचपन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में प्रबल इच्छा के साथ जाना चाहते थे ।जो बड़े होकर भी उनके मन में ये सोच अपनी जगह बनाती रही ।जब मनोहर यूरोप में थे तो वहां पर यूरोपीय भारतीयों के लिए एक क्लब की स्थापना की जिसका नाम “एसोसिएशन ऑफ यूरोपियन इंडियन” रखा ।जिसका मुख्य उद्देशय भारत के लोगों में भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जागरूकता लाना था ।
मनोहर ने “लीग ऑफ नेशनस “ में भी भाग लिया ।ब्रिटिश राज्य के एक सहयोगी के रूप में भारत का प्रतिनिधत्व एक बीकानेर के महाराजा द्वारा किया गया था लेकिन लोहिया इसके अपवाद थे ।
दर्शक गैलरी में विरोध प्रदर्शन शुरू किया और समाचार पत्रों के माध्यम से अपने विरोध के कारणों को पत्रिकाओं के संपादकों को कई पत्र लिखे।इस पूरे घटनाक्रम ने उस समय में रातों रात राम मनोहर लोहिया को भारत में विख्यात प्रसिद्धि दिलाई थी ।
भारत लौटने पर भारतीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए और सन्1934 में कांग्रेस सॉसिलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी ।पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1936 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया ।

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देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने और उत्तेजक बयान देने के लिए 24 मई 1939 को पहली बार गिरफ्तार किए गए ।लेकिन उनके समर्थकों और युवाशक्ति के डर से उन्हें अगले दिन ही रिहा कर दिया गया ।
“सत्याग्रह नाउ” नामक लेख लिखने पर 1940 में राम मनोहर लोहिया को पुन: गिरफ्तार कर लिया गया ।और अगले दो वर्ष के लिए कठोर कारावास भेज दिया । बाद में 1941 में उन्हें आज़ाद किया गया ।“भारत छोड़ो आन्दोलन” के दौर में सन् 1942 में मौलाना आज़ाद , महात्मा गांधी , वल्लभ भाई पटेल जैसे कई बड़े हस्तियों के साथ राम मनोहर लोहिया को भी गिरफ्त में लिया गया ।

इसके पश्चात मनोहर दो बार जेल गए एक दफा उन्हें मुंबई से गिरफ्तार कर लाहौर भेज दिया। स्वतंत्रता के नजदीकी समय के दौरान उन्होंने अपने भाषणों और लेखों के माध्यम से देश के विभाजन का विरोध किया था ।वे हिंसा के खिलाफ थे
और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत की आज़ादी के जश्न में जब सभी लोग और नेता दिल्ली में इक्कट्ठे थे उस समय राम मनोहर लोहिया अवांछित विभाजन के प्रभाव (दुख ) की वजह से महात्मा गांधी के साथ दिल्ली से बाहर थे ।

स्वतंत्रता के पश्चात गतिविधियां
राम मनोहर लोहिया राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए आज़ादी के बाद भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपना कार्य करते रहे ।उन्होंने आम जनता और निजी भागीदारों से अपील करते हुए कहा ,कि नेहरों , बाबड़ी , कुओं , सड़कों का निर्माण कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण में भागीदार बनें।

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राम मनोहर लोहिया ने “तीन आना , पंद्रह आना “ के माध्यम से प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर किए जाने वाले खर्च की राशि को “एक दिन 25000 रुपए “ के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। जो आज भी लोगों में बहुचर्चित हैं। उस समय के दौर में बहुत से लोगों की आमदनी भारत में मात्र “तीन आना” थी ।जबकि “पंद्रह आना” भारत सरकार के योजना आयोग के डाटा के हिसाब से थी ।

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Ram Manohar Lohia ,उन सभी मुद्दों को जनता के सामने रखा जो लंबे समय से राष्ट्र की सफलता में बाधा बनते रहे ।अपने लेखन और भाषण के माध्यम से उन्होंने जागरूकता की मुहिम शुरू की और जातिगत भेदभाव ,अमीर गरीब , स्त्री पुरुष असमानताओं को दूर करने का कार्य किया ।
उन्होंने “हिन्द किसान पंचायत “ का कृषि संबधित समस्याओं को देखते हुए संगठन बनाया।वे सीधे तौर पर सरकार से जारी की गई केंद्रीय योजनाओं को जनता के हाथों में देकर सीधे तौर पर उन्हें लाभ पहुंचाने और शक्ति प्रदान करने के पक्षधर थे ।अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने देश के युवाओं के साथ भारतीय साहित्य व कला और राजनीति जैसे विषयों पर चर्चा की ।

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निधन
57 साल की उम्र में 12 अक्टूबर 1967 को नई दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया ।वर्तमान समय में इस अस्पताल का नाम डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल हैं।

राम मनोहर लोहिया की वीडियो बायोग्राफी देखें।

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एम करुणानिधि की जीवनी पढ़े ।

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एम करुणानिधि जीवन परिचय, राजनीतिक और लेखन जीवन , हिंदी में – M Karunanidhi biography in Hindi

एम करुणानिधि जीवन परिचय, राजनीतिक और लेखन जीवन , हिंदी में – M Karunanidhi biography in Hindi

जन्म 3 जून 1924
निधन 7 अगस्त 2018

भारतीय राजनीति के लम्बे सफ़र तय करने वाले राजनेता मुतुवेल करुणानिधि तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री थे ।वे द्रविड़ मुनेन कड़गम राजनीतिक दल के प्रमुख नेता थे । सी एन अनादुरई के मौत के बाद सन् 1969 में डी. एम. के. नेता बने थे ।और वहां के लगातार पांच बार मुख्यमंत्री रहे ।उनका मुख्य रूप से 60 साल के राजनीतिक करियर के चुनावी भागीदारी में जीत दर्ज करने का रिकॉर्ड रहा । डी. एम. के. के नेतृत्व में उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों में तमिलनाडु और पदुचेरी में डी, एम, के, के नेतृत्व में 40 सीटों पर जीत दर्ज की । इसके बाद लोकसभा के 2009 चुनाव में डी, एम,के, द्वारा जीती गई सीटों की संख्या को 16 से 18 तक पहुंचाया और तमिलनाडु और पदूचेरी में यू, पी, ए के साथ गठबंधन करने पर 28 सीटों पर जीत दर्ज की ।उन्होंने नाटककार और पटकथा लेखक के रूप में तमिल सिनेमा में अपना योगदान दिया ।उनके समर्थक उन्हें “कला का विद्वान “ और कलाईनार के नाम से बुलाते थे । करुणानिधि का निधन कावेरी अस्पताल में 7 अगस्त 2018 को हुआ ।।

अनुक्रम

करुणानिधि का आरम्भिक जीवन
करुणानिधि का पटकथा लेखन
करुणानिधि का राजनीतिक जीवन
करुणानिधि का साहित्य में योगदान
व्यक्तिगत जीवन

करुणानिधि का आरम्भिक जीवन

3 जून 1924 को एम करुणानिधि का जन्म मूतुवेल और अंजुगम के ब्रिटिश भारत के नागपहिनाम के तिरुक्कुभलई में दक्षिणमूर्ति के रूप में हुआ ।उनके परिवार का संबध हिंदी समुदाय से रहा ।

पटकथा लेखन
करुणानिधि का पटकथा लेखन , तमिल फिल्म उद्योग में पटकथा लेखक के रूप करियर की शुरुआत करते हुए हुआ ।इसके साथ अपने भाषण कौशल और तेज बुद्धि के कारण बहुत जल्द एक प्रसिद्ध राजनेता बन गए । द्रविड़ आंदोलन से उनका गहरा जुड़ाव रहा और उसके पश्चात बुद्धिजीवी आदर्शो और समाजवादी सुधार के तौर पर कहानियां लिखने में काफी मशहूर थे । पराशक्ति नामक फिल्म के माध्यम से तमिल सिनेमा में अपने राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू किया इस फिल्म के रिलीज होने पर कई प्रतिबंध लगे ।लेकिन इसके बावजूद 1952 में इसे पर्दे पर उतारा गया था और बॉक्स ऑफिस पर अपना गहरा रंग छोड़ने में सफल रही। इस फिल्म ने द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा का पूरे तरीके से समर्थन किया ।और दो अभिनेताओं एस, एस, राजेंद्र और शिवाजी गणेशन को दुनिया के सामने परिचित करवाया ।ये फिल्में कुछ रूढ़िवादी सोच से भी घिरी क्योंकि इसमें ब्रहामण वर्ग की आलोचना भी की गई थी ।इसके साथ उनकी दो अन्य फ़िल्म थांगर्थानम और पनाम थी ।जिनका आधार आत्मसम्मान विवाह , विधवा पुनर्विवाह , जमींदारी का उन्मूलन और जो धार्मिक पाखंड इत्यादि शामिल था उनके सामाजिक मुद्दों पर लोकप्रिय नाटक और फिल्में अत्यधिक रूप से सेंसरशिप के आगे हार भी गई इसके चलते उनके दो नाटक 1950 में प्रतिबंधित कर दिए गए थे ।।

राजनीति में प्रवेश
14 साल की उम्र में राजनीति में प्रवेश किया और जस्टिस पार्टी के अलगीरिस्वामी के एक भाषण से प्रेरित होकर करुणानिधि ने हिंदी विरोधी आंदोलन में भाग लिया ।उन्होंने स्थानीय युवाओं के साथ अपने इलाके में एक संगठन की स्थापना भी की।इसके बाद उन्होंने एक छात्र संगठन तमिलनाडू तमिल मनावर मंद्रम के नाम से बनाया ।जो द्रविड़ आंदोलन का पहला छात्र विंग था ।और इन सभी छात्रों और युवाओं को समाजिक कार्य में शामिल कर लिया ।
करुणानिधि का राजनीति में अपना हाथ मजबूत करने के लिए अका कल्लाकुड़ी में हिंदी विरोधी विरोध प्रदर्शन में शामिल होना अहम रूप से प्रमुख कारण रहा था।
करुणानिधि ने हिंदी विरोध प्रदर्शन में रेलवे स्टेशन से हिंदी नाम मिटा दिया था और रेलगाड़ियों के रास्ते रोककर पटरी पर लेट गए थे ।इस विरोध प्रदर्शन के चलते दो लोग मौत के घाट उतर गए थे और। करुणानिधि को गिरफ्तार कर लिया गया था ।

सत्ता प्राप्ति
करुणानिधि 1957 में तमिलनाडु विधानसभा तिरुचिरापल्ली ज़िले के कुलिथलाई से पहली बार चुने गए ।अपने लंबे करियर के दौरान तमिलनाडु राजनीतिक क्षेत्र से पार्टी और सरकार में विभिन्न कार्य पदों पर नियुक्त रह चुके है।
प्रमुख प्रतिद्वंदी जे, जयललिता के हारने के बाद मई 2006 के चुनाव में 13 मई 2006 को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का पद संभाला ।

साहित्य
तमिल साहित्य में करुणानिधि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।उनके खाते में पटकथाएं , चिट्ठियां, उपन्यास, कविताएं, जीवनी, ऐतिहासिक उपन्यास, संवाद, मंच नाटक , गाने शामिल हैं।

पुस्तकें
करुणानिधि की प्रमुख पुस्तकें है – तेनपंडी सिंगम , नेजुक निदी , संग तमिल, पोत्रेर, इत्यादि उनकी गद्य व पद्य की पुस्तकें लगभग सौ से भी अधिक हैं।

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मंचकला
करुणानिधि के नाटक जैसे ओरे रदम, पालानी अप्पन तुक्कु मेडई , कागी दप्पु , मनिमागुदाम इत्यादि हैं।

पटकथाएं
जुपिटर पिक्चर्स के लिए 20 वर्ष की उम्र में करुणानिधि ने पटकथा लिखना शुरू किया ।अपनी पहली फिल्म “राजकुमारी” से अपनी लोकप्रियता बनाई । पटकथा लेखन के हूंनर सुधार आता गया और लिखते लिखते उन्होंने 75 पटकथाएं लिख डाली हैं।जिसमें से कुछ के नाम अबिमन्यू , मंदिरी कुमारी , मनागमन, देवकी, पड़ाद थेनिक्कल, युलियिन , इत्यादि।

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संपादक और प्रकाशक के रूप में कार्य
बचपन में ही उन्होंने मुरासोली नामक एक मासिक अखबार के संस्थापक और संपादक के रूप में कार्य किया।10 अगस्त 1942 को मुरासोली का आरंभ किया। जो बाद में साप्ताहिक और अब दैनिक अखबार बन गया है।


व्यक्तिगत जीवन
करुणानिधि पहले मांसाहारी थे लेकिन बाद में शाकाहारी बन गए वे कहते थे कि उनकी स्फूर्ति और सफलता का कारण उनका दैनिक रूप से योगाभ्यास करना था ।उनकी तीन बार शादी हुए ।पहली पत्नी पद्मावती ,दूसरी दयालु आम्माल और तीसरी राजातियम्माल थी ।

करुणानिधि की वीडियो में बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

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जिग्नेश मेवानी की जीवनी, परिचय,हिंदी में – Biography of Jignesh Mevani , Early Life,in Hindi Article

जिग्नेश मेवानी की जीवनी, परिचय,हिंदी में – Biography of Jignesh Mevani , Early Life,in Hindi Article

जन्म – 11 दिसंबर 1982

जिग्नेश मेवानी गुजरात से  एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं।वे गुजरात विधान सभा के सदस्य के रूप में वड़गाम निर्वाचन क्षेत्र से युवा नेता हैं ।वे वकील और समाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहे हैं ।उन्होंने भारतीय जाति में निचले तबके की जातियां और उसमें प्रताड़ित लोगों के हितों के लिए काम किया और 2016 में लोगों के दिलों में जगह कायम की ।

प्रारंभिक जीवन

जिग्नेश मेवानी अहमदाबाद में 11 दिसंबर  1982  गुजरात में पैदा हुआ ।उनके परिवारजन मिऊ गांव के मूल निवासी हैं। जो फैजाबाद जिले में आता है ।जिग्नेश ने अपनी स्कूल की शिक्षा अहमदाबाद के स्वास्तिक विद्यायल और विश्व विद्यालय माध्यमिक शाला से करी। तथा कॉलेज उनका एच के आर्ट्स कॉलेज अहमदाबाद , उन्होंने 2003 में इंग्लिश लिट्रेचर में कला स्नातक की डिग्री हासिल की।उसके बाद उन्होंने पत्रकारिता और जन संचार में डिप्लोमा किया । गुजराती पत्रिका में एक रिपोर्टर के तौर पर 2004  से  2007 तक कार्य करते रहे । डी. टी. लॉ कॉलेज ,अहमदाबाद से उन्होंने 2013 में कानून की डिग्री हासिल की ।

कैरियर
उना गांव जो गुजरात के सौरष्ट्र इलाके में आता है।वहां दलित वर्ग पर हमला होने के बाद कुछ समुह और लोगो ने दावा किया कि गुजरात में  इस मामले को लेकर कड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ ।


बाद में दलित  अस्मिता यात्रा जो अहमदाबाद से उना तक की गई उसमे प्रमुख रूप से जिग्नेश मेवानी ने पूरी जनसमर्थन का. नेतृत्व किया ।और इसमें भाग लेने वाली जनता करीब -करीब महिलाओं सहित बीस हजार दलित समाज था । जिन्होंने अपने पारंपरिक नौकरियां और पशुओं के शव न  हटाने की प्रतिज्ञा की थी।जिग्नेश ने दलित लोगों की प्रताड़ना और उस से लड़ने और उनके उत्थान के लिए भूमि की मांग की ।

जिग्नेश मेवानी ,हार्दिक पटेल ,अल्पेश ठाकोर गुजरात के 2017 के विधानसभा चुनावों में गुजरात की राजनीति में उभरते चहरे लोगों के सामने आए और जीत हासिल कर लोगों के दिलों को जीता ।

कथित रूप से 2017 के गुजरात चुनाव में जिग्नेश ने मोदी पर राजनैतिक प्रहार करते हुए कहा कि मोदी मानसिक रूप से अब बूढ़ा हो चुका है अब उन्हें राजनीति छोड़कर रिटायर हो जाना चहिए और हिमालय के शिखर पर चले जाना चाहिए ।

जिग्नेश दलित लोगों के लिए कार्य करने वाले नेता के रूप में गुजरात विधानसभा क्षेत्र बडगाम के चुने हुए नेता हैं। और वे दलित अत्याचार लड़त समिति के संयोजक हैं।
वे समाजिक कार्यकर्ता होने के साथ साथ अंग्रेज़ी साहित्य के पढ़े लिखे बुद्धिजीवी है और पेशे से वकील और पत्रकार भी रह चुके हैं।

जिग्नेश मेवानी ने अगस्त  2016 में एक विशाल रैली का नेतृत्व और आयोजन किया और उनके साथ 20,000 दलितों ने हिस्सा लिया ।

अपनी राजनीतिक सफर में जिग्नेश , हार्दिक पटेल ,और अप्लेश ठाकोर ने 2017 विधानसभा चुनावों से शुरुआत की।
जिग्नेश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करते हुए 2017 के चुनावों में कहा ” नरेंद्र मोदी को मानसिक रूप से एक बूढ़ा व्यक्ति बताया और कहा ” मोदी को रिटायर हो जाना चाहिए और हिमालय की चोटी पर जा कर आश्रय लेना चाहिए ।

राजनीति जीवन
बडगाम निर्वाचन क्षेत्र से , गुजरात विधान सभा चुनाव 2017 में एक स्वतंत्र उमीदवार के रूप में चुनाव मैदान में जिग्नेश उतरे और उन्हें आम आदमी पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन था और चुनाव में जीत दर्ज करवाई ।

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