डॉ राम मनोहर लोहिया जीवन परिचय -Ram Manohar Lohia biography in Hindi

डॉ राम मनोहर लोहिया जीवन परिचय -Ram Manohar Lohia biography in Hindi


राम मनोहर लोहिया
राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी
जन्म -23 मार्च 1910, अकबरपुर, फैज़ाबाद
निधन – 12 अक्टूबर 1967 , नई दिल्ली
कार्य क्षेत्र -स्वतंत्रता सेनानी,राजनेता

राम मनोहर लोहिया एक प्रखर समाजवादी और स्वतंत्रता सेनानी और सम्मानित राजनीतिज्ञ थे ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी दिलाने में अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अतुल्य योगदान दिया ।उनमें से एक सपूत राम मनोहर लोहिया भी रहे ।वे एक आशावादी और बेहद साहसी व्यक्तितव के कर्मठ व्यक्ति थे ।उनका जीवन चरित्र प्रगतिशील विचारधारा रखने वाले जनमानस के लिए सदैव प्रेरणादायक बना रहा ।
आज़ादी की लड़ाई में और सत्य के पथ पर मनोहर अटूट विश्वास के साथ लड़ते रहे । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत की राजनीति में बहुत नेता आए जिन्होंने अपने अटूट विश्वास के दम पर राजनीति का रुख बदल कर रख दिया ।राम मनोहर लोहिया भी उन्हीं में से एक थे ।
अपनी देशभक्ति और समाजवादी विचारधारा को बुलंद आवाज़ के साथ जनता के बीच पहुंचाने के लिए जाने गए ।और इन्हीं गुणों के कारण अपने समर्थकों और विरोधी दलों में भी खूब वाहवाही बटोरी ।

राम मनोहर लोहिया का प्रारंभिक जीवन

23 मार्च 1910 को उतर प्रदेश के अकबरपुर में राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ । उनके पिता का नाम श्रीहीरालाल था पेशे से एक शिक्षक व दिल से सच्चे राष्ट्रभक्त थे ।मनोहर की माता भी अध्यापिका थी ।मनोहर जब बहुत छोटे थे तब उनकी मां का निधन हो गया था ।
अपने पिता के साथ युवा मनोहर को अलग अलग रैलियों और विरोध प्रदर्शन व सभाओं के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हिसा लेने की प्ररेणा मिली ।
उनके जीवन में नया मोड़ लाना वाला समय तब था जब मनोहर के पिता उन्हें अपने साथ महात्मा गांधी से मिलाने के लिए साथ लेकर गए ।मनोहर के पिता महात्मा गांधी के बहुत बढ़े अनुयाई थे ।मनोहर महात्मा गांधी के सोच और विचारों से काफी प्रेरित हुए ।तभी से जीवनभर गांधी के आदर्शों का पालन और समर्थन करते रहे ।
पंडित जवाहलाल नेहरू से पहली बार 1921 में मिले।और उनके साथ कुछ सालों तक उनकी देखरेख में काम किया ।लेकिन कुछ राजनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों का आपसी टकराव हुआ और दूरियां बना ली।
1928 में किशोर लोहिया ने मात्र 18 साल की उम्र में ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित “साइमन कमीशन “ का विरोध किया और विरोध प्रदर्शन का आयोजन भी खुद संभाला ।

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राम मनोहर लोहिया प्रथम श्रेणी से मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद इंटरमीडिट में दाखिला हिंदी विश्वविदयालय बनारस में लिया ।उसके बाद अपनी स्नातक की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय से पूरी की और पी. एच. डी. शोध के लिए विश्वविद्यालय बर्लिन , जर्मनी चले गए ।जहां से 1932 में पीएचडी पूरी की । उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक परफॉर्मेंस के लिए उन्हें वितीय सहायता भी मिली ।

राम मनोहर लोहिया की विचारधारा

भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में मनोहर ने अंग्रेज़ी से अधिक हिंदी को प्राथमिकता दी।उनका मानना था कि “अंग्रेज़ी” शिक्षित और अशिक्षित समाज के बीच दूरी पैदा करता है।उनका कहना था कि हिंदी के बोलचाल से नए राष्ट्र के निर्माण से जुड़े विचारों को बढ़ावा मिलेगा ।
वे जातिवाद और भेदभाव के घोर विरोधी थे ।उनका जाति व्यवस्था पर सुझाव था कि “रोटी और बेटी “ के माध्यम से जातपात को समाप्त किया का सकता हैं।
उनका कहना था कि जाति भेदभाव दूर हो और सभी लोग मिलजुलकर रहे और खाना खाएं और उच्च और निम्न वर्ग का विवाह रिवाज़ सरल रूप से बिना किसी ऊंच नीच के संपन्न हो ।

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इस प्रकार “यूनाइटेड सोसिलिस्ट पार्टी “ में उच्च पदों पर किए गए चुनाव के टिकट निम्न जाति के उम्मीदवार को देकर भी उन्हें प्रोत्साहन और बढ़ावा दिया ।वे बेहतर स्कूलों की स्थापना और समान शिक्षा के अवसर पर भी अपने विचार रखते थे ।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
राम मनोहर लोहिया बचपन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में प्रबल इच्छा के साथ जाना चाहते थे ।जो बड़े होकर भी उनके मन में ये सोच अपनी जगह बनाती रही ।जब मनोहर यूरोप में थे तो वहां पर यूरोपीय भारतीयों के लिए एक क्लब की स्थापना की जिसका नाम “एसोसिएशन ऑफ यूरोपियन इंडियन” रखा ।जिसका मुख्य उद्देशय भारत के लोगों में भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जागरूकता लाना था ।
मनोहर ने “लीग ऑफ नेशनस “ में भी भाग लिया ।ब्रिटिश राज्य के एक सहयोगी के रूप में भारत का प्रतिनिधत्व एक बीकानेर के महाराजा द्वारा किया गया था लेकिन लोहिया इसके अपवाद थे ।
दर्शक गैलरी में विरोध प्रदर्शन शुरू किया और समाचार पत्रों के माध्यम से अपने विरोध के कारणों को पत्रिकाओं के संपादकों को कई पत्र लिखे।इस पूरे घटनाक्रम ने उस समय में रातों रात राम मनोहर लोहिया को भारत में विख्यात प्रसिद्धि दिलाई थी ।
भारत लौटने पर भारतीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए और सन्1934 में कांग्रेस सॉसिलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी ।पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1936 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया ।

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देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने और उत्तेजक बयान देने के लिए 24 मई 1939 को पहली बार गिरफ्तार किए गए ।लेकिन उनके समर्थकों और युवाशक्ति के डर से उन्हें अगले दिन ही रिहा कर दिया गया ।
“सत्याग्रह नाउ” नामक लेख लिखने पर 1940 में राम मनोहर लोहिया को पुन: गिरफ्तार कर लिया गया ।और अगले दो वर्ष के लिए कठोर कारावास भेज दिया । बाद में 1941 में उन्हें आज़ाद किया गया ।“भारत छोड़ो आन्दोलन” के दौर में सन् 1942 में मौलाना आज़ाद , महात्मा गांधी , वल्लभ भाई पटेल जैसे कई बड़े हस्तियों के साथ राम मनोहर लोहिया को भी गिरफ्त में लिया गया ।

इसके पश्चात मनोहर दो बार जेल गए एक दफा उन्हें मुंबई से गिरफ्तार कर लाहौर भेज दिया। स्वतंत्रता के नजदीकी समय के दौरान उन्होंने अपने भाषणों और लेखों के माध्यम से देश के विभाजन का विरोध किया था ।वे हिंसा के खिलाफ थे
और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत की आज़ादी के जश्न में जब सभी लोग और नेता दिल्ली में इक्कट्ठे थे उस समय राम मनोहर लोहिया अवांछित विभाजन के प्रभाव (दुख ) की वजह से महात्मा गांधी के साथ दिल्ली से बाहर थे ।

स्वतंत्रता के पश्चात गतिविधियां
राम मनोहर लोहिया राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए आज़ादी के बाद भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपना कार्य करते रहे ।उन्होंने आम जनता और निजी भागीदारों से अपील करते हुए कहा ,कि नेहरों , बाबड़ी , कुओं , सड़कों का निर्माण कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण में भागीदार बनें।

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राम मनोहर लोहिया ने “तीन आना , पंद्रह आना “ के माध्यम से प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर किए जाने वाले खर्च की राशि को “एक दिन 25000 रुपए “ के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। जो आज भी लोगों में बहुचर्चित हैं। उस समय के दौर में बहुत से लोगों की आमदनी भारत में मात्र “तीन आना” थी ।जबकि “पंद्रह आना” भारत सरकार के योजना आयोग के डाटा के हिसाब से थी ।

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Ram Manohar Lohia ,उन सभी मुद्दों को जनता के सामने रखा जो लंबे समय से राष्ट्र की सफलता में बाधा बनते रहे ।अपने लेखन और भाषण के माध्यम से उन्होंने जागरूकता की मुहिम शुरू की और जातिगत भेदभाव ,अमीर गरीब , स्त्री पुरुष असमानताओं को दूर करने का कार्य किया ।
उन्होंने “हिन्द किसान पंचायत “ का कृषि संबधित समस्याओं को देखते हुए संगठन बनाया।वे सीधे तौर पर सरकार से जारी की गई केंद्रीय योजनाओं को जनता के हाथों में देकर सीधे तौर पर उन्हें लाभ पहुंचाने और शक्ति प्रदान करने के पक्षधर थे ।अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने देश के युवाओं के साथ भारतीय साहित्य व कला और राजनीति जैसे विषयों पर चर्चा की ।

चौधरी चरण सिंह की जीवनी पढ़े ।

निधन
57 साल की उम्र में 12 अक्टूबर 1967 को नई दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया ।वर्तमान समय में इस अस्पताल का नाम डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल हैं।

राम मनोहर लोहिया की वीडियो बायोग्राफी देखें।

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एम करुणानिधि की जीवनी पढ़े ।

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मोरारजी देसाई जीवनी , परिचय ,हिंदी में -Biography of Morarji Desai ,Early Life,in Hindi, Article

मोरारजी देसाई जीवनी , परिचय ,हिंदी में -Biography of Morarji Desai ,Early Life,in Hindi, Article

जन्म – 29 फ़रवरी 1896
मृत्यु – 10 अप्रैल  1995

मोरार्रजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री बने जो उस समय के एकमात्र ऐसे व्यक्ति जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बजाय अन्य राजनीति दल के प्रधानमंत्री रहे। मोरारजी का प्रधानमंत्री कार्यकाल 1977 से  1979 तक रहा । मोरारजी अकेले व्यक्ति रहे जिन्हे भारत में सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न और पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार निशान- ए – पाकिस्तान से नवाजा गया था ।

मोरारजी 81 साल में आज़ाद भारत के चौथे प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।ऐसा नहीं हैं कि इस से पहले उन्होंने कभी प्रधानमंत्री बनने की कोशिश न की हो ,कई बार की ,लेकिन असफल रहे।और ऐसा भी नहीं था कि मोरारजी प्रधानमंत्री बनने के योग्य नहीं थे। वरिष्ठ नेता होने के बाद भी कांग्रेस में वे दुर्भाग्यशाली रहे कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री के मृत्यु के पश्चात भी प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त नहीं हुए। मार्च 1977 में मोरारजी देश के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए , लेकिन कुछ राजनैतिक कलह के चलते इनका कार्यकाल पूरा नहीं हो पाया ।और चौधरी चरण सिंह के साथ मतभेदों के बढ़ते उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा ।

प्रारभिंक जीवन परिचय

गुजरात के भदेली नामक स्थान पर मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी  1896 को हुआ था ।उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था ।उनके पिता का नाम  रनछोड़जी देसाई था वे स्कूल अध्यापक के तौर पर भावनगर (सौराष्ट्र) में कार्यरत थे ।वे निराशा और खिन्नता के साथ अवसाद का शिकार हो चुके थे ।और इसके चलते उन्होंने आत्महत्या करके कुएं में कूद कर अपना जीवन समाप्त कर लिया ।तीसरे दिन मोरारजी देसाई ने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात शादी कर ली।

व्यावसायिक जीवन

मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से मोरारजी की शिक्षा – दीक्षा पूरी हुई और ये कॉलेज उस समय के सबसे महंगा और खर्चीला कॉलेज माना जाता था ।मुंबई में गोकुलधाम तेजपाल के नाम से प्रसिद्द आवास गृह में मोरारजी निशुल्क रहे। उस आवास में एक साथ चालीस विद्यार्थी रह सकते थे। मोरोराजी देसाई विद्यार्थी जीवन में एक औसत बुद्धि के विवेकशील छात्र थे ।वाद – विवाद टीम का सचिव कॉलेज में इन्हे ही बनाया जाता था ।मुश्किल से कभी स्वयं मोरोर्जी ने वाद – विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लिया होगा ।कॉलेज जीवन से ही मोरारजी देसाई अक्सर बाल गंगाधर तिलक , महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू  और अन्य महत्वपूर्ण नेताओं के भाषणों  को सुना करते थे।

1917 में मोरारजी देसाई ने मुंबई प्रोविंशल सिविल सेवा में आवेदन करने का विचार किया और बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर्स में प्रविष्टी पाई । वे बतौर उप जिलाधीश 1918 में अहमदाबाद पहुंचे ।उन्होंने ब्रिटिश कलेक्टर (जिलाधीश) चेटफील्ड के अन्तर्गत काम किया ।लेकिन अपने रूखे स्वभाव के मोरारजी ग्यारह वर्ष तक विशेष पोस्ट पर नहीं पहुंच सके।और कलेक्टर के निजी सहायक  पद तक ही सीमित रहे ।

राजनीतिक जीवन

1930  में ब्रिटिश हुकूमत की नौकरी छोड़कर मोरोजी देसाई स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही बन गए ।उसके एक साल बाद गुजरात प्रदेश के कांग्रेस कमेटी के सचिव बने।उन्होंने सरदार पटेल के निर्देश पर भारतीय युवा कांग्रेस की शाखा स्थापित की और उसके अध्यक्ष पद को संभाला ।मोरारजी को 1932 में दो साल की जेल हुई। बाद में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 1937 तक भारतीय युवा कांग्रेस  को मार्गदर्शन दिया । इसके पश्चात वे बंबई राज्य के कांग्रेस मत्रिमंडल में शामिल हुए ।बताया जाता है। कि मरोराजी देसाई अपनी बातों को आमतौर पर हमेशा ऊपर रखते थे और उन्हें सही मानते थे और लोग इन्हे व्यंगात्मक रूप से “सर्वोच्च नेता ” कहा करते थे । उन्हें ऐसा लोगों के द्वारा कहां जाना पसंद भी आता था ।समाचार पत्रों में अक्सर उनके व्यक्तित्व को लेकर. ऐसे व्यंग्य कार्टून भी प्रकाशित होते थे ।व्यंग्य में इनके चित्र एक लम्बी छड़ी के साथ और गांधी टोपी पहन के दिखाए जाते थे ।इसमें हंसी मजाक में व्यंग्य ये होता था कि, एक अपनी बात पर अड़ियल व्यक्ति जो गांधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं।

मोरारजी देसाई के कई वर्ष जेल में गुजरे जब वे स्वतंत्रता संग्राम में भागीदार रहे ।राष्ट्रीय राजनीति के साथ इनका नाम ,देश की आज़ादी में वजनदार हो चुका था।लेकिन प्राथमिक स्तर की रुचि मोरारजी की राज्य की राजनीति में थी । यही कारण है कि उन्हें 1952 में बंबई का मुख्यमंत्री पद दिया गया ।इस समय में महाराष्ट्र बंबई और गुजरात प्रोविंस के नाम से मशहूर थे ।लेकिन पृथक गठन इन दोनों राज्यों का अभी तक नहीं हुआ था।
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर 1967 को मोरारजी को उप – प्रधानमंत्री बनाया गया लेकिन वे कुछ बातों को लेकर  विशेष रूप से कुंठित थे कि कांग्रेस पार्टी का वरिष्ठ नेता होने पर भी उनकी बजाय इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया ।माना जाता है । कि यही कारण है।मोरारजी निरंतर इंदिरा गांधी के क्रांतिकारी फैसलों और उपायों में बाधा डालते. रहे ।हालांकि जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करने की मांग हुए थी तब मोरारजी भी उस दौड़ में दावेदारी रखने लगे और जब नहीं हटे तब पार्टी ने इस मुद्दे पर चुनाव करवा दिया और भारी मतांतर से इंदिरा गांधी ने बाजी मारी थी ।लेकिन बाद में मोरारजी को उसी सदन में उप प्रधानमंत्री का पद मिला था ।

प्रधानमंत्री पद

कांग्रेस में पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय जो अनुशासन था वो बाद में बिखरने लगा । कुछ पार्टी के नेता खुद को पार्टी से बड़ा समझते थे ।उनमें से मोरारजी देसाई भी एक थे ।कांग्रेस पार्टी के वफादार सिपाही और नेता के रूप में श्री लाल बहादुर शास्त्री ने कार्य किया ।उन्होंने अपने कार्यकाल में पार्टी से कभी भी किसी पद की मांग नहीं की ।लेकिन इस मामले में सबसे ज्यादा अपवाद में मोरारजी देसाई रहे ।उनके मतभेद कांग्रेस पार्टी के साथ जगजाहिर थे।इनकी प्राथमिकताओं में देश का प्रधानमंत्री बनना शामिल था ।
कांग्रेस पार्टी और उनके नेता जब ये समझने लगे कि मोरारजी देसाई उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।तब बहुत से नेताओं के साथ इंदिरा गांधी ने भी उन्हें कतरना आरंभ कर दिया ।
मोरारजी देसाई 1975 में जनता पार्टी में सम्मिलित हो गए और जब लोकसभा चुनाव हुए  तो जनता पार्टी ने कांग्रेस की भ्रष्टचार और आपातकाल जैसी कमियों को जनता के सामने रखकर  स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफलता हासिल की ।और उनकी 1977 में सरकार बनी और उन्हें प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया । लेकिन दो अन्य दावेदार यहां पर भी। प्रधानमंत्री के लिए मौजूद थे । जगजीवन राम और। चौधरी चरण सिंह ।लेकिन कांग्रेस पार्टी के। नेता जो कभी कांग्रेसी हुआ करते थे   “नेता जयप्रकाश नारायण” उन्होंने किंग मेकर की स्थिति का फायदा उठाते हुए मोरारजी देसाई को समर्थन दिया ।

23 मार्च  1977  को 81 साल के मोरारजी देसाई ने भारत के चौथे प्रधानमंत्री पद का दायित्व ग्रहण किया ।इनके कार्यकाल में जो 9 राज्य कांग्रेस शासित थे ठीक उन्हीं सरकारों को तोड़ दिया गया ,भंग कर दिया गया और दोबारा चुनाव कराने की घोषणा भी करवा दी।ये असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक कदम था ।जो बदले की भावना से लिया गया निर्णय था  वास्तव में  जनता पार्टी , कांग्रेस का और इंदिरा गांधी का देश से सफाया करने में कृत्संकल्प नजर आईं। लेकिन बुद्धिजीवियों द्वारा इस कृत्य को सराहना नहीं मिली ।

निधन
राजनीति से मोराजी देसाई ने 83 वर्ष की उम्र में सन्यास ले लिया और मुंबई में रहने लगे ।99 वर्ष की उम्र में 10 अप्रैल 1995 को उनका  निधन हो गया ।

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सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवनी -Biography of Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi , Early Life , Article

सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवनी -Biography of Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi , Early Life , Article

जन्म – 31 अक्टूबर  1875
मृत्यु – 15 दिसंबर1950

सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतंत्र भारत के पहले उप- प्रधानमंत्री बने ।उन्होंने राजनेता और अधिवक्ता के रूप में कार्य किया ।जनता ने उन्हें सरदार पटेल के नाम से जाना । वे भारतीय राजनीतिज्ञ थे ।सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय कांग्रेस के सीनियर नेता और भारतीय गणराज्य के संस्थापक पिता थे ।उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में मुख्य भूमिका निभाई और आज़ाद भारत में एकीकरण का मार्गदर्शन किया ।भारत और दूसरी देशों में उन्हें प्राय उर्दू,हिंदी और फारसी में सरदार कहा जाता था ।सरदार का मतलब होता हैं प्रमुख । राजनीतिक एकीकरण और भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान 1947 में उन्होंने गृह मंत्री के रूप में भारत को मार्गदर्शन दिया ।
182 मीटर ऊंची प्रतिमा गुजरात के केवड़िया में सरदार वल्लभ भाई पटेल की बनाई गई हैं जिसका अनावरण लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के 143 वीं जयंती पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया । एकीकरण के सूत्रधार बिस्मार्क से सरदार पटेल की अक्सर तुलना की जाती है कि ना तो सरदार पटेल  ने कभी मूल्यों से समझौता किया ना कभी बिस्मार्क ने । भारत जब आज़ाद हुआ तब 562 रियायतें मौजूद थीं सरदार पटेल ने इन्हे एक धागे में पिरोने और बनाने का काम किया जिसकी कल्पना करना भी उस समय कठिन था ।सरदार के अटल इराद्दों और दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते पर ही उन्हें लौह पुरुष कहा जाता है ।

प्रारंभिक जीवन

31 अक्टूबर 1875 को सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म गुजरात के नाडियाड में हुआ । उनकी माता का नाम लाड़बा पटेल और पिता का झावेर भाई पटेल था ।सरदार पटेल मां- बाप की चौथी संतान थे वे बहुत कुशाग्र बुद्धि जीवी थे

नरसिभाई ,विट्टलभाई ,सोमाभाई उनके अग्रज थे  ।सरदार पटेल की शुरू से  रुचि पढ़ने में अधिक थी ।मात्र सोलह वर्ष की उम्र में सरदार पटेल की शादी हो गई थी।उनकी पत्नी का नाम झवेरबा था ।उनके बच्चों में बेटे का नाम दाहया भाई पटेल और बेटी का नाम मणी बेन था । सरदार पटेल की  मुख्यत  शिक्षा स्वाध्याय से हुई बाद में विदेश जाकर लंदन से बैरिस्टर की शिक्षा ग्रहण की और वापिस भारत लौटे और अहमदाबाद में वकालत करते लगे ।भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया ।सबसे बड़ा योगदान खेड़ा संघर्ष 1918 में सरदार पटेल,गांधी जी और अन्य लोगों ने मिलकर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें भयंकर सूखे के चपेट में आए किसानों को अग्रेज़ सरकार से भारी कर में छूट की मांग करते हुए कर न देने पर प्रेरित किया ।इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी सरकार को झुकना पड़ा और उस साल करों में राहत दी गई ये सरदार पटेल और उनके साथियों की पहली सफलता थी ।सरदार पटेल की इस घटना के बाद गांधी उनसे बहुत प्रभावित हुए ।

गांधी से मुलाकात
1917 की बात है जब गुजरात में सूखा ,अकाल और इन्फ्लूएंजा जैसे बीमारी लोगों को ग्रसित कर रही थी ।तब पहली दफा सरदार पटेल की गांधी से मुलाकात हुई ।पटेल ने इस स्थिति में एक अस्थाई अस्पताल बनवाया और गांधी उनकी प्रशासकीय कार्यक्षमता से काफी प्रभावित भी हुए । इस अस्थाई अस्पताल में इन्फ्लूजा जैसे घातक बीमारी का इलाज यही हुआ। अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ नो टैक्स मूवमेंट चलता और किसानों का उस साल का कर माफ कराया। बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए मोर्चा संभाला।और 1928 में उस वक्त ही किसानों ने वल्लव भाई पटेल को “सरदार ” की उपाधि दी । गुजरात प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने।

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भारत बिखरने के लिए नहीं बना
1947 में भारत आज़ाद तो हुआ लेकिन बिखरा होने के साथ 562 रियायतें थीं। कुछ बहुत बड़ी फैली हुए तो कुछ छोटी दायरे में ज्यादातर राजा अपनी मनमानी के चलते विलय पर उतारू थे ।कुछ आज़ाद भी रहना चाहते थे मतलब ये देश की एकता के लिए मुसीबत थे ।जब सरदार पटेल ने इन्हे  समझौते पर बुलाया तो ये तैयार नहीं हुए तब पटेल ने सैन्य शक्ति का प्रयोग किए। देश vकी एकता और अखंडता का श्रेय सरदार पटेल को ही जाता है ।उनका कहना था कि मेरा भारत बिखरने के लिए नहीं बना हैं।
राजनीतिक सफर
आज़ाद भारत के गृहमंत्री के तौर पर पहले व्यक्ति थे ।सरदार पटेल ने आई सी एस का (भारतीय नागरिक सेवाएं) भारतीयकरण करके इन्हें आई .ए .एस (भारतीय  प्रशासनिक सेवाएं) बनाया। वर्ष 1991 में मरणोपरांत सरदार पटेल को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार *भारत रत्न* से नवाजा गया उनके पौत्र विपिनभाई पटेल द्वारा ये अवॉर्ड स्वीकार किया गया ।अहमदाबाद। के हवाई अड्डे का नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल के सम्मान में उनके नामकरण करके सरदार वल्लभ भाई पटेल अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा अहमदाबाद रखा गया है।

अहमदाबाद के शाहीन बाग में सरदार पटेल की यादों को ताजा रखने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल मेमोरियल सोसायटी में सरदार पटेल का 3D संग्रहालय तैयार किया गया है।


सरदार पटेल अपने अंग्रेज़ी पहनावे और उच्च स्तरीय तौर तरीकों और चुस्त, फैशनपरस्त गुजरात क्लब में ब्रिज के चैंपियन होते हुए काफी विख्यात थे ।

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लेकिन सरदार पटेल ने  1920 के असहयोग आन्दोलन में स्वदेशी धोती कुर्ता,चप्पल और खादी अपनाए और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते विदेशी कपड़ों की होली जलाई ।

कमजोर मुकदमों को सटीकता के साथ प्रस्तुत करके सरदार पटेल ने  पुलिस के गवाहों और अंग्रेज़ न्यायधीशों को चुनौती देकर विशेष जगह बनाई ।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सरदार पटेल कई मरतबा जेल के अंदर बाहर हुए ।इतिहासकार हमेशा से जिस चीज के बारे। में जानने के लिए उत्साहित रहते हैं वो जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल की आपसी तालमेल और सम्बन्धों को लेकर और उनके बीच की प्रतिस्पर्धा । लाहौर अधिवेशन 1929 में सरदार पटेल ही महत्मा गांधी के बाद दूसरे सबसे मजबूत और प्रबल दावेदार थे ।माना जाता है कि सरदार पटेल की मुस्लिमो के प्रति हठधर्मिता की वजह से गांधी ने उनका नाम वापिस ले लिया ।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर 1945-46 में सरदार पटेल भी मुख्य उम्मीदवार थे ।लेकिन गांधी जी ने नेहरू प्रेम में उन्हें इस दावेदारी से दूर रखा ।

बहुत से इतिहासकार मानते हैं।यदि प्रधानमंत्री पद पर पहले व्यक्ति सरदार पटेल होते तो भारत को चीन और पाकिस्तान से युद्ध में पूर्ण रूप से सफलता मिली होती ।
गांधी जी के प्रति श्रद्धा

गांधी के लिए सरदार पटेल की अटूट श्रद्धा थी निजी रूप से गांधी की हत्या से कुछ समय पहले बात करने वाले पटेल अंतिम व्यक्ति थे । गृह मंत्री होने के नाते उन्होंने सुरक्षा में चूक को अपनी गलती माना था।ठीक गांधी की हत्या के दो महीने बाद सरदार पटेल की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थीं।

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स्टैचू ऑफ यूनिटी

2018 में तैयार हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा को प्रधानमंत्री मोदी जी। ने उनके 137 वें  जयंती पर 31 अक्टूबर 2018 को राष्ट्र को समर्पित किया ।इस प्रतिमा का बनने का समय पांच वर्ष और खर्च लगभग 3000 करोड़ रुपए में तैयार हुई हैं।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

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अटल बिहारी वाजपेई की जीवनी, परिचय,हिंदी -Biography of Atal Bihari Vajpayee and Early Life in Hindi

अटल बिहारी वाजपेई की जीवनी, परिचय,हिंदी -Biography of Atal Bihari Vajpayee and Early Life in Hindi

पुरस्कार और सम्मान

(1)1992 में देश की अभूतपूर्व सेवाओं के लिए “पद्म विभूषण ” सम्मान ।
(2)1993 ,कानपुर यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि का सम्मान।
(3)1994 , लोकमान्य तिलक अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
(4)1994 ,पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से नवाजा गया।
(5)1994, सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान।
(6)2015,देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार”भारत रत्न” से नवाजा ।
(7)2015,बांग्लादेश द्वारा “लिब्रेशन वार अवॉर्ड ” दिया गया ।

अटल बिहारी वाजपेई जीवन भर राजनीति में सक्रिय रहे । पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद एकमात्र ऐसे नेता रहे जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला ।वे भारत के सबसे प्रेरक और सम्माननीय राजनीतिज्ञो में से एक रहे ।अटल जी ने विभिन्न परिषदों और संगठनों के मेंबर के तौर पर अपनी भूमिका निभाते हुए सेवाएं दी।अटल जी प्रखर वक्ता और प्रभावशाली कवि थे ।एक बड़े नेता के तौर पर वे अपनी लोकतांत्रिक, साफ़ छवि और उदार विचारों के लिए जाने गए।अटल जी को 2015 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान”भारत रत्न” से नवाजा गया ।

प्रारंभिक जीवन

25 दिसंबर 1924 को अटलजी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ ।वे सात भाई – बहन थे उनकी माता का नाम कृष्णा देवी और पिता का कृष्ण बिहारी था ।उनके पिता विद्वान और स्कूल शिक्षक थे अटल जी अपनी स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद लक्ष्मीबाई कॉलेज  और डी. ए.वी  कॉलेज कानपुर आ गए ।यहां से इन्होंने इकोनॉमिक्स सबजेक्ट में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। उन्होंने लखनऊ से आगे की पढ़ाई के लिए आवेदन भरा लेकिन पढ़ाई जारी नहीं कर पाए ।बाद में इन्होंने बतौर संपादक आरएसएस द्वारा प्रकाशित पत्रिका में नौकरी की । हालांकि अटल जी ताउम्र अविवाहित रहे ।उन्होंने बी एन कौल की दो बेटियों नंदिता और नमिता को गोद लिया ।

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करियर

अटल जी ने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपनी  राजनैतिक यात्रा का शुभारंभ किया ।भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लेने पर 1942 में अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिए गए।श्यामा प्रसाद मुखर्जी से पहली मुलाकात उनकी इसी दौरान हुए ।जो बी जे एस के नेता यानी भारतीय जनसंघ के नेता थे।अटल जी ने उनके राजनैतिक एजेंडे में सहयोग दिया । स्वास्थ्य संबंधी समस्या के चलते मुखर्जी का निधन हो  गया ।बाद में बी जे एस का कार्यकाल अटल जी के कंधों पर आ गया और इस संगठन के एजेंडे और विचारों को आगे बढ़ाया ।लोकसभा चुनावों में बलरामपुर सीट से1954 में संसद सदस्य निर्वाचित हुए । विस्तृत नजरिए और राजनीतिक जानकारी ने उन्हें छोटी उम्र में राजनीति जगत में सम्मान और पहचान दिलाने में मदद की। जब मोरारजी देसाई की सरकार 1977 में बनी तो अटल जी को विदेश मंत्री का पद दिया गया । दो साल बाद अटल जी ने चीन की यात्रा की ।यात्रा का मकसद चीन सम्बन्धों पर चर्चा करना था।1971 में भारत- पाक के युद्ध के कारण प्रभावित व्यापारिक संबंधों को सुधारने के लिए पाकिस्तान की भी यात्रा की। आरएसएस पर जब जनता पार्टी ने हमला किया तब अटल जी ने 1979 में मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया ।

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अटल जी व आरएसएस से आए लाल कृष्ण आडवाणी तथा बीजेएस और भैरों सिंह शेखावत व अन्य साथियों ने सन् 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी । पहले पांच साल “स्थापना के” अटल जी खुद बीजेपी के अध्यक्ष रहे ।।
भारत में प्रधानमंत्री के तौर पर
लोकसभा चुनाव के बाद सन 1996 में बीजेपी को सत्ता में आने का मौका मिला और अटल जी प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।लेकिन कुछ दिनों में ही बहुमत सिद्ध न कर पाने पर सरकार गिर गई और अटल जी को मात्र 13 दिनों के अंदर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा ।
एक बार फिर बीजेपी 1998 में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने पर सरकार बनाने में कामयाब रही।लेकिन इस बार सरकार तेरह महीनों तक चल सकी।क्यूंकि अपना समर्थन वापिस लेते हुए आॅल इंडिया द्रविड़ मुनेन काजगम पार्टी ने सरकार गिरा दी।अटल जी के योगदान और नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने  राजस्थान के पोखरण में मई 1998 में परमाणु परीक्षण कराए।
एनडीए(नेशनल डेमक्रेटिक एलायंस ) को 1999 लोकसभा चुनाव में सरकार बनाने की सफलता प्राप्त हुई और अटल जी एक बार फिर प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।इस बार पूरे पांच साल पूरे करने पर एनडीए पार्टी  पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी ।अटल जी ने निजी   क्षेत्र और आर्थिक सुधार के लिए सहयोगी दलों के मजबूत समर्थन से कई योजनाएं शुरू की। औद्योगिक क्षेत्र में अटल जी ने राज्यों के दख़ल को सीमित करने का प्रयास किया ।सूचना तकनीकी और विदेशी निवेश की दिशा में अटल जी ने शोध को बढ़ावा दिया ।भारत की अर्थव्यवस्था पर अटल जी ने नई नीतियों और विचारों के परिणाम स्वरूप त्वरित विकास हासिल किया । यू एस ए और पाक के साथ दोस्ताना व्यवहार कायम करके अपनी सरकार में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत किया ।हालांकि विदेश नीतियों पर अटल जी की सरकार ज्यादा बदलाव नहीं ला सकी लेकिन फिर भी इन नीतियों की सराहना हुई।
एनडीए के पूरे पांच साल होने के बाद पूरे आत्मविश्वास के साथ अटल जी के नेतृत्व में लोकसभा चुनावों में बीजेपी एक बार फिर चुनाव में उतरी लेकिन इस बार यूपीए (कांग्रेस) ने सफलापूर्वक अपनी सरकार बनाई ।
और इसके साथ ही अटल जी ने सक्रिय राजनीति से दिसंबर 2005 में संन्यास लेने की घोषणा कर दी।
व्यक्तिगत जीवन
अटलजी समस्त जीवन में अविवाहित रहे और उन्होंने बी एन कौल की बेटी नमिता भट्टाचार्य को गोद लिया था ।

मृत्यु
अटल जी एक बार 2009 में दिल का दौरा पड़ने से जूझ चुके थे जिसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता रहा । ग्यारह जून 2018 को उन्हें एम्स (अखिल भारतीय आयु्विज्ञान संस्थान) में भर्ती किया गया था । सोलह अगस्त 2018 को अटलजी परलोक सिधार गए । सत्रह अगस्त को उनकी मुंह बोली बेटी नमिता कौल ने उन्हें मुखाग्नि दी।राजघाट के नजदीक शांति वन में स्मृति स्थल में उनकी समाधि बनाई गई हैं।

जीवन घटनाक्रम (टाइमलाइन)
1924 * अटल जी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ ।
1942 *भारत छोड़ो आन्दोलन में भागीदारी ।
1957 *लोकसभा सीट के लिए चुने गए ।
1980 *बीजेपी की स्थापना ।
1992 *पद्म विभूषण सम्मान।
1996 * प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त।
1998 *दूसरी बार प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत।
1999 *तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने।
2005 *राजनीति से सन्यास ।
2015 *भारत रत्न से सम्मानित।
2108 *11 जून ,2018 , मृत्यु

अटल जी का कविता सग्रह से दिखाई गई एक कविता

अरूण कुमार
Source: Kavita sangrah

अटल जी की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें ।

पंडित जवाहरलाल नेहरु का जीवन परिचय,जीवनी,हिंदी, Biography of Jawaharlal Nehru in Hindi

पंडित जवाहरलाल नेहरु का जीवन परिचय,जीवनी,हिंदी, Biography of Jawaharlal Nehru in Hindi

नाम – जवाहर लाल मोतीलाल नेहरू।

जन्म– चौदह नवंबर 1889 , इलाहाबाद,भारत ।

मृत्यु -27 मई1964 (उम्र 74 साल ) नई दिल्ली, भारत।

पिता – मोती लाल नेहरु ।

माता- स्वरूप रानी नेहरू।

विवाह – कमला नेहरू ।

उपलब्धियां

पंडित जवाहरलाल नेहरू असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदार रहे , इलाहाबाद में 1924 नगर निगम अध्यक्ष चुने गए और शहर के प्रमुख कार्य अधिकारी के रूप में अपना योगदान दिया उसके बाद 1929 में कांग्रेस के  लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए आजादी की मांग का प्रस्ताव पारित किया और 1946 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए बाद में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने । पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले नेताओं में सबसे आगे रहे आजादी के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने पंडित जवाहर नेहरू को भारत के आधुनिक समय में भारत के निर्माता के रूप में जाना जाता है ।पंडित नेहरू को बच्चो से बहुत लगाव और प्रेम था इसलिए बच्चे उन्हें चाचा नेहरू बोला करते थे ।

प्रारंभिक जीवन

14 नवंबर 1889 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ ।इनके पिता मोतीलाल नेहरू एक प्रसिद्ध वकील इलाहाबाद में कार्यरत थे उनकी माता का नाम स्वरूपरानी था पंडित जवाहरलाल नेहरू मोतीलाल नेहरू के इकलौते उत्तराधिकारी थे पंडित नेहरू की तीन बहनें थीं और इनका परिवार कश्मीरी वंश में सारस्वत ब्राह्मण समाज का था ।
पंडित नेहरू ने अपनी शिक्षा दुनिया के सबसे अच्छे स्कूलों और कॉलेजों से ग्रहण की ।उन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा हैरो से की और ग्रेजुएशन कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी लॉ ऑफ कॉलेज से डिग्री पूरी की ।इंग्लैंड में रहकर वहां पर सात सालों मे पंडित नेहरू ने फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए तर्कसंगत सोच ओर दृष्टिकोण विकसित किया ।

करियर

1912 में पंडित नेहरू भारत लौट आएं और यहां वकालत की शुरुआत की ।1916 में नेहरू जी का विवाह कमला नेहरू से हुआ । 1917 में नेहरू होम रूल लीग से जुड़ गए ।राजनीत की असली शुरुआत 1919 में हुई जब पहली बार महात्मा गांधी के संपर्क में आए ।उस समय रॉलेट अधिनियम के खिलाफ महात्मा गांधी एक अभियान चला रहे थे ।उस समय गांधी के “सक्रिय और शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा आन्दोलन” के प्रति पंडित नेहरू अच्छे खासे प्रभावित हुए ।
पंडित जवहरलाल नेहरू में गांधी जी ने पहली बार स्वयं कल्पना करते हुए आशा की एक किरण और भारत का भविष्य देखा ।
नेहरू परिवार ने अपने आप को गांधी जी द्वारा दी गई दिक्षाओं के हिसाब से खुद को मजबूत किया और इसके साथ ही मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू ने पश्चिमी लिवास और महंगी चीज़ों के साथ महंगी सम्पत्ति का त्याग कर दिया ।वे अब एक गांधी टोपी और खादी कपड़े पहनने लगे । 1920-1922 में जवाहर लाल नेहरू ने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और गिरफ्तार भी हुए लेकिन कुछ महीनों के पश्चात उन्हें रिहा कर दिया गया ।

1924 में जवाहर लाल नेहरु इलाहाबाद नगर निगम के चुनाव में अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने दो वर्ष तक शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दी ।यहां का प्रशासनिक अनुभव उनके लिए मूल्यवान साबित हुआ जब वे देश के पहले प्रधानमंत्री बने ।पंडित नेहरू ने अपने कार्यकाल का सदुपयोग करते हुए स्वास्थ्य- सेवा , सार्वजनिक- शिक्षा और साफ- सफाई के विस्तार को मध्य नज़र रखते हुए काम किया ।ब्रिटिश सरकार का सहयोग न मिलने से उन्होंने 1926 में इस्तीफा दे दिया ।

पंडित नेहरू ने 1926-1928 तक महासचिव के रूप में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में अपनी सेवाएं दी ।और वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में किया गया
।इस सत्र के दौरान सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरू ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का पक्ष रखा और समर्थन किया ।जबकि अन्य नेताओं के साथ मोतीलाल नेहरू ब्रिटिश सरकार के अंदर ही प्रभुत्व सम्पूर्ण राज्य चाहते थे ।इस मुद्दे को गंभीर रूप से सोचविचार कर हल करने के लिए महात्मा गांधी ने बीच का रास्ता दिखाते हुए कहा कि भारत के राज्य का दर्जा देने के लिए ब्रिटेन को “दो साल का समय” दिया जायेगा । ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस के द्वारा पूर्ण रूप से “राजनैतिक स्वतंत्रता” के पक्ष में राष्ट्रीय आंदोलन शुरू कर दिया जाएगा ।जब पंडित जवारहलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने ब्रिटिश सरकार से समय को कम से कम एक साल कर दिया जाए करने की मांग की तो सरकार की तरफ से कोई जबाव नहीं मिला ।
कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन 1929 दिसंबर , लाहौर में आयोजित हुआ जिसमें कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को चुना गया ।चुनाव के समय में नेहरूजी ने पार्टी के बाहर रहते हुए भी पार्टी के लिए ज़ोर शोर से राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया । लगभग कांग्रेस ने हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केंद्रीय असेम्बली में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की ।1936 और 1937 से लेकर 1946 में नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए ।और गांधी जी के साथ राष्ट्रव्यापी आंदोलन में सक्रिय रूप से दूसरे नंबर के नेता बन गए ।भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्हें 1942 में गिरफ्तार भी किया गया और बाद में 1945 में छोड़ दिया गया । भारत- पाकिस्तान- विभाजन के दौरान आज़ादी के मुद्दे पर ब्रिटिश सरकार के साथ हुए बातचीत में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

पंडित नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री 1947 में बने । पाकिस्तान के साथ नए समझौते पर बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन और दंगे,भारतीय संघ में करीब करीब पांच सौ रियायतों का एकीकरण ,नए संविधान का निर्माण और निर्देशन,संसदीय लोकतंत्र कार्यप्रणाली के लिए राजनैतिक तथा प्रशासनिक ढांचे की स्थापन आदि विकट और चुनौतियों से भरे समय का सामना पंडित नेहरू ने प्रभावी तरीके से किया ।

भारत के विकास के लिए पंडित नेहरू का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।इन्होनें योजना आयोग का गठन करते हुए साइंस और टेक्नोलॉजी के विकास को बढ़ावा दिया और तीन पंचवर्षीय योजनाओं का लगातार शुभारंभ किया ।देश में उनकी नीतियों के कारण कृषि और उद्योग से एक नए युग की शुरुआत हुई।भारत की विदेश नीति विकास में नेहरू जी ने मुख्य भूमिका निभाई । एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए पंडित नेहरू ने नासिर और टिटो के साथ मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन की रचना रची ।पंडित नेहरू कोरियाई युद्ध का पतन करने और स्वेज नहर विवाद सुलझाने तथा कांगो समझौते के पक्ष में भारत की सेवाओं और इंटरनेशनल पुलिस व्यवस्था की पेशकश को मूर्तरूप देने जैसे विभिन्न इंटरनेशनल समस्याओं के समाधान में प्रमुख रूप से अपना योगदान दिया और मध्यस्थ भूमिका में रहे ।

लाओस, अस्ट्रिया,बर्लिन जैसे अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के समाधान के लिए भी उनका योगदान पर्दे के पीछे रहकर भी सुझाव और सलाह के तौर पर महत्वपूर्ण रहा।

पंडित नेहरू चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के आपसी तालमेल और सम्बन्धों में सुधार नहीं कर पाए।चीन के साथ सीमा विवाद रास्ते के पत्थर साबित हुए और पाकिस्तान के एक समझौते पर आने के बाद कश्मीर मुद्दा सामने आया ।भारत पर चीन ने 1962 में हमला बोल दिया जिसका पूर्वानुमान लगाने में नेहरू असफल रहे ।ये वारदात उनके लिए एक बहुत बड़ी नाकामयाबी थी और उनकी मौत भी शायद इस असफलता के कारण हुई। पंडित जवाहलाल नेहरू की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से 27 मई 1964 को हुई।।

पंडित जवाहरलाल नेहरु की वीडियो में जीवनी देखे ।