चौधरी चरण सिंह की जीवनी, परिचय,हिन्दू में – Choudhary Charn Singh Biography, Early Life,In Hindi , Article

चौधरी चरण सिंह की जीवनी, परिचय,हिंदी में – Choudhary Charn Singh Biography, Early Life,In Hindi , Article

जन्म – 23 दिसंबर 1902 यूनाइटेड प्रोविंस , नूरपुर, ब्रिटिश इंडिया
मृत्यु – 29 मई 1987
कार्य – भारत के पूर्व प्रधानमंत्री , राजनेता

भारत के पांचवे प्रधानमंत्री पद के रूप में चौधरी चरण सिंह ने  कार्य किया वे एक राजनेता रहे ।किसानों की आवाज.  बुलंद   करने वाले  नेता के संदर्भ में चौधरी चरण सिंह को भारत में “किसानों के मसीहा” के रूप में जाना जाता  है।  हालांकि  प्रधानमन्त्री के  तौर पर उनका कार्यकाल  बहुत  कम रहा । प्रधानमंत्री पद से पूर्व उन्होंने उप- प्रधानमंत्री  व गृह मंत्री के रूप में भी अपनी   सेवाएं दी । उत्तर  प्रदेश  राज्य  के  दो  बार मुख्यमंत्री रहे और इस से पहले उन्होंने दूसरे मंत्रालयों में भी कार्यभार संभाला।चौधरी चरण सिंह मात्र पांच महीने तक ही देश के प्रधानमंत्री पद पर रह सके और बाद में त्यागपत्र दे दिया ।

प्रारंभिक जीवन

23 दिसंबर 1902   को चौधरी चरण सिंह का जन्म , यूनाइटेड प्रोविंस (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के गांव नूरपुर में एक किसान परिवार में हुआ । बल्लभगढ़ के राजा नाहर   सिंह  से इनके  परिवार का अच्छा संबध था ।
1887 की  क्रांति  में  इस  राज  परिवार की  मुख्य भूमिका रही थी ।दिल्ली  के चांदनी  चौक  में नाहर  सिंह  को  ब्रिटिश हुकूमत ने  फांसी  पर चढ़ा  दिया था ।नाहर  सिंह के समर्थक और चौधरी चरण सिंह के दादा उतर प्रदेश के बुलंशहर  जिले  में अंग्रजों  के  अत्याचार  से बचने के लिए निष्क्रमण कर गए ।

शैक्षणिक वातावरण चौधरी चरण सिंह को शुरुआत से ही अच्छा  प्राप्त  हुआ जिस  कारण  उनकी शिक्षा के प्रति अच्छी लग्न रही।नूरपुर से उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई  और  मैट्रिकुलेशन  के लिए  उन्हें  सरकारी  स्कूल मेरठ   में  दाखिला   मिल  गया ।  विज्ञान   विषय  में चरण सिंह ने 1923 में ग्रेजुएशन की ।दो साल के बाद चरण सिंह ने 1925 में  कला  वर्ग में स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की ।   इसके   अलावा   उन्होंने  कानून  की   पढ़ाई  आगरा   यूनिवर्सिटी   से  पूरी  की   और  1928  में गाजियाबाद में  वकालत शुरू  की।अपनी ईमानदारी , कर्तव्यनिष्ठा ,और  साफगोई  के  लिए  जाने जाते थे ।उनका मुकदमों को लेने का तरीका ओरों से बिल्कुल अलग था ।वो सिर्फ  उन्हीं  मुकदमों को लेते थे जिसमे मुवकिल का पक्ष उन्हें न्यायपूर्ण प्रतीत होता था ।

राजनैतिक जीवन
1929  में   कांग्रेस के  लाहौर  अधिवेशन  के पश्चात गाजियाबाद  में  कांग्रेस  कमेटी  का गठन किया और सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान चौधरी चरण सिंह को  1930 में  नमक कानून  तोड़ने  पर  6 महीने की सजा  सुनाई  गई । देश के  स्वतंत्रता  संग्राम में  चरण सिंह ने जेल  से रिहा  होने के  बाद  स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया ।

1937,छपरौली  (बागपत)  से  विधान  सभा के लिए मात्र 34 साल की उम्र में चुने गए ।और विधानसभा में कृषकों के  अधिकार  की रक्षा के लिए एक बिल पास किया,  किसानों  द्वारा  ये   बिल  उनकी  फसलों  के विपड़न से संबधित था ।बाद में इस बिल को देश के तमाम राज्यों ने अपनाया ।

गांधी जी द्वारा  किया  व्यक्तिगत सत्याग्रह  में  चौधरी चरण सिंह  को  1940  में गिरफ्तार किया गया ।कुछ महीनों के बाद अक्टूबर 1941 में रिहा किए गए ।जब पूरे  देश  में  1942  में  असंतोष  व्याप्त था ।”भारत छोड़ो” के  माध्यम  से जब गांधी जी ने  “करो या मरो ” का  आह्वान  किया  था ।चरण  सिंह  ने  उस दौरान भूमिगत  होकर  मेरठ, मवाना ,  सर्थना , गाजियाबाद, बुलंदशहर  आदि गांव में प्रचार करके गुप्त क्रांतिकारी संगठन  तैयार  किया ।पुलिस  दिन रात चरण सिंह के पीछे  पड़ी  थी और  अंत में  उन्हें  गिरफ्तार कर लिया गया ।उसके बाद  ब्रिटिश  सरकार द्वारा उन्हें डेढ़ साल की  सजा  सुनाई । उन्होंने “शिष्टाचार”के नाम से एक पुस्तक भी उस दौरान जेल में लिखी ।

स्वाधीनता के बाद

नेहरू  के   सोवियत  पद्वति   पर  आधारित  आर्थिक सुधारों का चरण सिंह ने डटकर विरोध किया । उनका कहना  था  कि  भारत  की खेती  सहकारी पद्वति पर आधारित  सफल  नहीं हो सकती ।किसान परिवार से नाता रखने  वाले चरण सिंह का कहना बिल्कुल साफ था कि  किसान  का मालिकाना हक और दावेदारी ही उन्हें खेती  के क्षेत्र  में आगे बढ़ा सकती हैं।माना जाता है कि चरण  सिंह  के राजनैतिक कैरियर पर नेहरू के सिध्दांतों का विरोध करना उन्हें महंगा पड़ा ।

1952-62-67   में   देश   की  आज़ादी  के  बाद विधानसभा चुनावों में जीतकर राज्य विधानसभा के लिए  चुने  गए ।”पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी ” के  पद  पर पंडित  गोविंद  वल्लभ  पंत  की  सरकार  में   इन्होंने अपनी  सेवाएं  दी । इस  दौरान उन्होंने अपनी सेवाएं  देते हुए न्याय , सूचना , राजस्व, चिकत्सा एवं स्वास्थ्य आदि  विभागों  में  अपने  दायित्व  का  निर्वहन किया । उत्तर  प्रदेश  सरकार  की कैबिनेट मंत्री का पद इन्हे  दिया गया  जिसके  अन्तर्गत  इन्होंने  1951  में न्याय और  सूचना  विभाग  का   कार्यभार  संभाला ।  डॉ संपूर्णानंद  की सरकार में इन्हे 1952 में कृषि विभाग और राजस्व की जिम्मेदारी प्राप्त हुई।

स्वाभाविक   रूप  से  चौधरी चरण  सिंह एक किसान परिवार से थे ।इसी कारण हमेशा से किसानों के हितों के लिए लगातार प्रयास करते रहे ।जब चंद्रभानु गुप्ता 1960 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तब चरण सिंह को कृषि मंत्रालय दिया गया ।

1967 में  चरण सिंह ने  कांग्रेस  पार्टी  छोड़  दी और “भारतीय क्रांति दल ” के नाम  से नई  राजनैतिक दल की  स्थापना  की ।  राम  मनोहर  लोहिया  और  राज नारायण  के  साथ  मिलकर  उन्होंने  उतर  प्रदेश  में सरकार  बनाई  और 1967 और  1979 में प्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभाला।

इंदिरा गांधी ने 1975 देश में आपातकाल घोषित कर दिया और  सभी   राजनैतिक दलों के विरोधी नेताओं को  जेल  में  डाल  दिया गया ,चौधरी  चरण सिंह भी उनमें  से एक थे ।ठीक आपातकाल  के दो  साल बाद 1977 में   आम  चुनाव  हुए  और  इंदिरा  गांधी  की जबरदस्त  हार हुई और केंद्र में मोरारजी के मार्गदर्शन में “जनता पार्टी ” की सरकार बनी। चरण सिंह ने इस सरकार  में  उप  प्रधानमंत्री  और  गृहमंत्री  के पद को संभाला।

प्रधानमंत्री पद

मोरारजी   देसाई  और  चौधरी  चरण सिंह के आपसी मतभेदों  के चलते  या ऐसे कहें की राजनैतिक कलह के कारण  जनता  पार्टी  की सरकार गिर गई ।जिसके बाद 28  जुलाई 1979 को  कांग्रेस और सीपीआई के समर्थन से  प्रधानमंत्री  पद  की शपथ ली।उन्हें बहुमत साबित  करने  के  लिए राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने 20 अगस्त का समय दिया लेकिन इंदिरा गांधी ने ठीक एक दिन पहले ही अपना समर्थन वापस ले लिया इस दौरान  चरण   सिंह   ने  संसद  का  रुख  लिए  बिना प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया ।

निजी जीवन
सन 1929  को  चरण सिंह  का  विवाह गायत्री देवी के साथ हुआ । इनकी  पांच  संताने हुई।अजित सिंह उनके  पुत्र “राष्ट्रीय लोक दल ” पार्टी के अध्यक्ष हैं।

लेखन

चौधरी चरण सिंह एक राजनेता के साथ एक कुशल लेखक भी थे । और  अंग्रजी भाषा पर अच्छी पकड़ रखते थे । उन्होंने” लीजेंड प्रोपराइटरशिप ” इंडियंस पॉवर्टी   एंड    इट्स   सॉल्यूशन ” ऑब्लिशन  ऑफ जमींदारी ”   पुस्तकों  को   लिखा । और  भारत  के साहित्य में अपना लेखकीय योगदान भी दिया ।

चौधरी चरण सिंह की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

प्रिय पाठक,इस लेख से संबधित आपका अपना सुझाव या विचार प्रकट करना चाहते हैं।तो कृपया कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

मोरारजी देसाई जीवनी , परिचय ,हिंदी में -Biography of Morarji Desai ,Early Life,in Hindi, Article

मोरारजी देसाई जीवनी , परिचय ,हिंदी में -Biography of Morarji Desai ,Early Life,in Hindi, Article

जन्म – 29 फ़रवरी 1896
मृत्यु – 10 अप्रैल  1995

मोरार्रजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री बने जो उस समय के एकमात्र ऐसे व्यक्ति जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बजाय अन्य राजनीति दल के प्रधानमंत्री रहे। मोरारजी का प्रधानमंत्री कार्यकाल 1977 से  1979 तक रहा । मोरारजी अकेले व्यक्ति रहे जिन्हे भारत में सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न और पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार निशान- ए – पाकिस्तान से नवाजा गया था ।

मोरारजी 81 साल में आज़ाद भारत के चौथे प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।ऐसा नहीं हैं कि इस से पहले उन्होंने कभी प्रधानमंत्री बनने की कोशिश न की हो ,कई बार की ,लेकिन असफल रहे।और ऐसा भी नहीं था कि मोरारजी प्रधानमंत्री बनने के योग्य नहीं थे। वरिष्ठ नेता होने के बाद भी कांग्रेस में वे दुर्भाग्यशाली रहे कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री के मृत्यु के पश्चात भी प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त नहीं हुए। मार्च 1977 में मोरारजी देश के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए , लेकिन कुछ राजनैतिक कलह के चलते इनका कार्यकाल पूरा नहीं हो पाया ।और चौधरी चरण सिंह के साथ मतभेदों के बढ़ते उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा ।

प्रारभिंक जीवन परिचय

गुजरात के भदेली नामक स्थान पर मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी  1896 को हुआ था ।उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था ।उनके पिता का नाम  रनछोड़जी देसाई था वे स्कूल अध्यापक के तौर पर भावनगर (सौराष्ट्र) में कार्यरत थे ।वे निराशा और खिन्नता के साथ अवसाद का शिकार हो चुके थे ।और इसके चलते उन्होंने आत्महत्या करके कुएं में कूद कर अपना जीवन समाप्त कर लिया ।तीसरे दिन मोरारजी देसाई ने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात शादी कर ली।

व्यावसायिक जीवन

मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से मोरारजी की शिक्षा – दीक्षा पूरी हुई और ये कॉलेज उस समय के सबसे महंगा और खर्चीला कॉलेज माना जाता था ।मुंबई में गोकुलधाम तेजपाल के नाम से प्रसिद्द आवास गृह में मोरारजी निशुल्क रहे। उस आवास में एक साथ चालीस विद्यार्थी रह सकते थे। मोरोराजी देसाई विद्यार्थी जीवन में एक औसत बुद्धि के विवेकशील छात्र थे ।वाद – विवाद टीम का सचिव कॉलेज में इन्हे ही बनाया जाता था ।मुश्किल से कभी स्वयं मोरोर्जी ने वाद – विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लिया होगा ।कॉलेज जीवन से ही मोरारजी देसाई अक्सर बाल गंगाधर तिलक , महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू  और अन्य महत्वपूर्ण नेताओं के भाषणों  को सुना करते थे।

1917 में मोरारजी देसाई ने मुंबई प्रोविंशल सिविल सेवा में आवेदन करने का विचार किया और बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर्स में प्रविष्टी पाई । वे बतौर उप जिलाधीश 1918 में अहमदाबाद पहुंचे ।उन्होंने ब्रिटिश कलेक्टर (जिलाधीश) चेटफील्ड के अन्तर्गत काम किया ।लेकिन अपने रूखे स्वभाव के मोरारजी ग्यारह वर्ष तक विशेष पोस्ट पर नहीं पहुंच सके।और कलेक्टर के निजी सहायक  पद तक ही सीमित रहे ।

राजनीतिक जीवन

1930  में ब्रिटिश हुकूमत की नौकरी छोड़कर मोरोजी देसाई स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही बन गए ।उसके एक साल बाद गुजरात प्रदेश के कांग्रेस कमेटी के सचिव बने।उन्होंने सरदार पटेल के निर्देश पर भारतीय युवा कांग्रेस की शाखा स्थापित की और उसके अध्यक्ष पद को संभाला ।मोरारजी को 1932 में दो साल की जेल हुई। बाद में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 1937 तक भारतीय युवा कांग्रेस  को मार्गदर्शन दिया । इसके पश्चात वे बंबई राज्य के कांग्रेस मत्रिमंडल में शामिल हुए ।बताया जाता है। कि मरोराजी देसाई अपनी बातों को आमतौर पर हमेशा ऊपर रखते थे और उन्हें सही मानते थे और लोग इन्हे व्यंगात्मक रूप से “सर्वोच्च नेता ” कहा करते थे । उन्हें ऐसा लोगों के द्वारा कहां जाना पसंद भी आता था ।समाचार पत्रों में अक्सर उनके व्यक्तित्व को लेकर. ऐसे व्यंग्य कार्टून भी प्रकाशित होते थे ।व्यंग्य में इनके चित्र एक लम्बी छड़ी के साथ और गांधी टोपी पहन के दिखाए जाते थे ।इसमें हंसी मजाक में व्यंग्य ये होता था कि, एक अपनी बात पर अड़ियल व्यक्ति जो गांधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं।

मोरारजी देसाई के कई वर्ष जेल में गुजरे जब वे स्वतंत्रता संग्राम में भागीदार रहे ।राष्ट्रीय राजनीति के साथ इनका नाम ,देश की आज़ादी में वजनदार हो चुका था।लेकिन प्राथमिक स्तर की रुचि मोरारजी की राज्य की राजनीति में थी । यही कारण है कि उन्हें 1952 में बंबई का मुख्यमंत्री पद दिया गया ।इस समय में महाराष्ट्र बंबई और गुजरात प्रोविंस के नाम से मशहूर थे ।लेकिन पृथक गठन इन दोनों राज्यों का अभी तक नहीं हुआ था।
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर 1967 को मोरारजी को उप – प्रधानमंत्री बनाया गया लेकिन वे कुछ बातों को लेकर  विशेष रूप से कुंठित थे कि कांग्रेस पार्टी का वरिष्ठ नेता होने पर भी उनकी बजाय इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया ।माना जाता है । कि यही कारण है।मोरारजी निरंतर इंदिरा गांधी के क्रांतिकारी फैसलों और उपायों में बाधा डालते. रहे ।हालांकि जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करने की मांग हुए थी तब मोरारजी भी उस दौड़ में दावेदारी रखने लगे और जब नहीं हटे तब पार्टी ने इस मुद्दे पर चुनाव करवा दिया और भारी मतांतर से इंदिरा गांधी ने बाजी मारी थी ।लेकिन बाद में मोरारजी को उसी सदन में उप प्रधानमंत्री का पद मिला था ।

प्रधानमंत्री पद

कांग्रेस में पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय जो अनुशासन था वो बाद में बिखरने लगा । कुछ पार्टी के नेता खुद को पार्टी से बड़ा समझते थे ।उनमें से मोरारजी देसाई भी एक थे ।कांग्रेस पार्टी के वफादार सिपाही और नेता के रूप में श्री लाल बहादुर शास्त्री ने कार्य किया ।उन्होंने अपने कार्यकाल में पार्टी से कभी भी किसी पद की मांग नहीं की ।लेकिन इस मामले में सबसे ज्यादा अपवाद में मोरारजी देसाई रहे ।उनके मतभेद कांग्रेस पार्टी के साथ जगजाहिर थे।इनकी प्राथमिकताओं में देश का प्रधानमंत्री बनना शामिल था ।
कांग्रेस पार्टी और उनके नेता जब ये समझने लगे कि मोरारजी देसाई उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।तब बहुत से नेताओं के साथ इंदिरा गांधी ने भी उन्हें कतरना आरंभ कर दिया ।
मोरारजी देसाई 1975 में जनता पार्टी में सम्मिलित हो गए और जब लोकसभा चुनाव हुए  तो जनता पार्टी ने कांग्रेस की भ्रष्टचार और आपातकाल जैसी कमियों को जनता के सामने रखकर  स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफलता हासिल की ।और उनकी 1977 में सरकार बनी और उन्हें प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया । लेकिन दो अन्य दावेदार यहां पर भी। प्रधानमंत्री के लिए मौजूद थे । जगजीवन राम और। चौधरी चरण सिंह ।लेकिन कांग्रेस पार्टी के। नेता जो कभी कांग्रेसी हुआ करते थे   “नेता जयप्रकाश नारायण” उन्होंने किंग मेकर की स्थिति का फायदा उठाते हुए मोरारजी देसाई को समर्थन दिया ।

23 मार्च  1977  को 81 साल के मोरारजी देसाई ने भारत के चौथे प्रधानमंत्री पद का दायित्व ग्रहण किया ।इनके कार्यकाल में जो 9 राज्य कांग्रेस शासित थे ठीक उन्हीं सरकारों को तोड़ दिया गया ,भंग कर दिया गया और दोबारा चुनाव कराने की घोषणा भी करवा दी।ये असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक कदम था ।जो बदले की भावना से लिया गया निर्णय था  वास्तव में  जनता पार्टी , कांग्रेस का और इंदिरा गांधी का देश से सफाया करने में कृत्संकल्प नजर आईं। लेकिन बुद्धिजीवियों द्वारा इस कृत्य को सराहना नहीं मिली ।

निधन
राजनीति से मोराजी देसाई ने 83 वर्ष की उम्र में सन्यास ले लिया और मुंबई में रहने लगे ।99 वर्ष की उम्र में 10 अप्रैल 1995 को उनका  निधन हो गया ।

मोरारजी देसाई की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें ।

प्रिय पाठक ,

लेख से जुड़ा कोई भी सुझाव या विचार आप देना चाहते हो तो कृपया कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवनी -Biography of Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi , Early Life , Article

सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवनी -Biography of Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi , Early Life , Article

जन्म – 31 अक्टूबर  1875
मृत्यु – 15 दिसंबर1950

सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतंत्र भारत के पहले उप- प्रधानमंत्री बने ।उन्होंने राजनेता और अधिवक्ता के रूप में कार्य किया ।जनता ने उन्हें सरदार पटेल के नाम से जाना । वे भारतीय राजनीतिज्ञ थे ।सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय कांग्रेस के सीनियर नेता और भारतीय गणराज्य के संस्थापक पिता थे ।उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में मुख्य भूमिका निभाई और आज़ाद भारत में एकीकरण का मार्गदर्शन किया ।भारत और दूसरी देशों में उन्हें प्राय उर्दू,हिंदी और फारसी में सरदार कहा जाता था ।सरदार का मतलब होता हैं प्रमुख । राजनीतिक एकीकरण और भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान 1947 में उन्होंने गृह मंत्री के रूप में भारत को मार्गदर्शन दिया ।
182 मीटर ऊंची प्रतिमा गुजरात के केवड़िया में सरदार वल्लभ भाई पटेल की बनाई गई हैं जिसका अनावरण लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के 143 वीं जयंती पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया । एकीकरण के सूत्रधार बिस्मार्क से सरदार पटेल की अक्सर तुलना की जाती है कि ना तो सरदार पटेल  ने कभी मूल्यों से समझौता किया ना कभी बिस्मार्क ने । भारत जब आज़ाद हुआ तब 562 रियायतें मौजूद थीं सरदार पटेल ने इन्हे एक धागे में पिरोने और बनाने का काम किया जिसकी कल्पना करना भी उस समय कठिन था ।सरदार के अटल इराद्दों और दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते पर ही उन्हें लौह पुरुष कहा जाता है ।

प्रारंभिक जीवन

31 अक्टूबर 1875 को सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म गुजरात के नाडियाड में हुआ । उनकी माता का नाम लाड़बा पटेल और पिता का झावेर भाई पटेल था ।सरदार पटेल मां- बाप की चौथी संतान थे वे बहुत कुशाग्र बुद्धि जीवी थे

नरसिभाई ,विट्टलभाई ,सोमाभाई उनके अग्रज थे  ।सरदार पटेल की शुरू से  रुचि पढ़ने में अधिक थी ।मात्र सोलह वर्ष की उम्र में सरदार पटेल की शादी हो गई थी।उनकी पत्नी का नाम झवेरबा था ।उनके बच्चों में बेटे का नाम दाहया भाई पटेल और बेटी का नाम मणी बेन था । सरदार पटेल की  मुख्यत  शिक्षा स्वाध्याय से हुई बाद में विदेश जाकर लंदन से बैरिस्टर की शिक्षा ग्रहण की और वापिस भारत लौटे और अहमदाबाद में वकालत करते लगे ।भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया ।सबसे बड़ा योगदान खेड़ा संघर्ष 1918 में सरदार पटेल,गांधी जी और अन्य लोगों ने मिलकर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें भयंकर सूखे के चपेट में आए किसानों को अग्रेज़ सरकार से भारी कर में छूट की मांग करते हुए कर न देने पर प्रेरित किया ।इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी सरकार को झुकना पड़ा और उस साल करों में राहत दी गई ये सरदार पटेल और उनके साथियों की पहली सफलता थी ।सरदार पटेल की इस घटना के बाद गांधी उनसे बहुत प्रभावित हुए ।

गांधी से मुलाकात
1917 की बात है जब गुजरात में सूखा ,अकाल और इन्फ्लूएंजा जैसे बीमारी लोगों को ग्रसित कर रही थी ।तब पहली दफा सरदार पटेल की गांधी से मुलाकात हुई ।पटेल ने इस स्थिति में एक अस्थाई अस्पताल बनवाया और गांधी उनकी प्रशासकीय कार्यक्षमता से काफी प्रभावित भी हुए । इस अस्थाई अस्पताल में इन्फ्लूजा जैसे घातक बीमारी का इलाज यही हुआ। अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ नो टैक्स मूवमेंट चलता और किसानों का उस साल का कर माफ कराया। बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए मोर्चा संभाला।और 1928 में उस वक्त ही किसानों ने वल्लव भाई पटेल को “सरदार ” की उपाधि दी । गुजरात प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने।

Arunsandhu
Source – Wiki

भारत बिखरने के लिए नहीं बना
1947 में भारत आज़ाद तो हुआ लेकिन बिखरा होने के साथ 562 रियायतें थीं। कुछ बहुत बड़ी फैली हुए तो कुछ छोटी दायरे में ज्यादातर राजा अपनी मनमानी के चलते विलय पर उतारू थे ।कुछ आज़ाद भी रहना चाहते थे मतलब ये देश की एकता के लिए मुसीबत थे ।जब सरदार पटेल ने इन्हे  समझौते पर बुलाया तो ये तैयार नहीं हुए तब पटेल ने सैन्य शक्ति का प्रयोग किए। देश vकी एकता और अखंडता का श्रेय सरदार पटेल को ही जाता है ।उनका कहना था कि मेरा भारत बिखरने के लिए नहीं बना हैं।
राजनीतिक सफर
आज़ाद भारत के गृहमंत्री के तौर पर पहले व्यक्ति थे ।सरदार पटेल ने आई सी एस का (भारतीय नागरिक सेवाएं) भारतीयकरण करके इन्हें आई .ए .एस (भारतीय  प्रशासनिक सेवाएं) बनाया। वर्ष 1991 में मरणोपरांत सरदार पटेल को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार *भारत रत्न* से नवाजा गया उनके पौत्र विपिनभाई पटेल द्वारा ये अवॉर्ड स्वीकार किया गया ।अहमदाबाद। के हवाई अड्डे का नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल के सम्मान में उनके नामकरण करके सरदार वल्लभ भाई पटेल अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा अहमदाबाद रखा गया है।

अहमदाबाद के शाहीन बाग में सरदार पटेल की यादों को ताजा रखने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल मेमोरियल सोसायटी में सरदार पटेल का 3D संग्रहालय तैयार किया गया है।


सरदार पटेल अपने अंग्रेज़ी पहनावे और उच्च स्तरीय तौर तरीकों और चुस्त, फैशनपरस्त गुजरात क्लब में ब्रिज के चैंपियन होते हुए काफी विख्यात थे ।

Arunsandhu
Source- Wikipedia

लेकिन सरदार पटेल ने  1920 के असहयोग आन्दोलन में स्वदेशी धोती कुर्ता,चप्पल और खादी अपनाए और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते विदेशी कपड़ों की होली जलाई ।

कमजोर मुकदमों को सटीकता के साथ प्रस्तुत करके सरदार पटेल ने  पुलिस के गवाहों और अंग्रेज़ न्यायधीशों को चुनौती देकर विशेष जगह बनाई ।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सरदार पटेल कई मरतबा जेल के अंदर बाहर हुए ।इतिहासकार हमेशा से जिस चीज के बारे। में जानने के लिए उत्साहित रहते हैं वो जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल की आपसी तालमेल और सम्बन्धों को लेकर और उनके बीच की प्रतिस्पर्धा । लाहौर अधिवेशन 1929 में सरदार पटेल ही महत्मा गांधी के बाद दूसरे सबसे मजबूत और प्रबल दावेदार थे ।माना जाता है कि सरदार पटेल की मुस्लिमो के प्रति हठधर्मिता की वजह से गांधी ने उनका नाम वापिस ले लिया ।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर 1945-46 में सरदार पटेल भी मुख्य उम्मीदवार थे ।लेकिन गांधी जी ने नेहरू प्रेम में उन्हें इस दावेदारी से दूर रखा ।

बहुत से इतिहासकार मानते हैं।यदि प्रधानमंत्री पद पर पहले व्यक्ति सरदार पटेल होते तो भारत को चीन और पाकिस्तान से युद्ध में पूर्ण रूप से सफलता मिली होती ।
गांधी जी के प्रति श्रद्धा

गांधी के लिए सरदार पटेल की अटूट श्रद्धा थी निजी रूप से गांधी की हत्या से कुछ समय पहले बात करने वाले पटेल अंतिम व्यक्ति थे । गृह मंत्री होने के नाते उन्होंने सुरक्षा में चूक को अपनी गलती माना था।ठीक गांधी की हत्या के दो महीने बाद सरदार पटेल की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थीं।

Arunsandhu
Source – wiki

स्टैचू ऑफ यूनिटी

2018 में तैयार हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा को प्रधानमंत्री मोदी जी। ने उनके 137 वें  जयंती पर 31 अक्टूबर 2018 को राष्ट्र को समर्पित किया ।इस प्रतिमा का बनने का समय पांच वर्ष और खर्च लगभग 3000 करोड़ रुपए में तैयार हुई हैं।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

इस लेख से जुड़ा कोई भी विचार या सुझाव आपका हों तो कृपया कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

राजीव गांधी की जीवनी, परिचय,हिंदी में – Rajiv Gandhi Biography, Early Life,in Hindi

Arunsandhu
Source- 1hindi.com

जन्म -20 अगस्त1944, मुंबई , महाराष्ट्र
मृत्यु- 21 मई 1991

उपलब्धियां

प्रारंभिक जीवन
राजीव गांधी का जन्म मुंबई ,महाराष्ट्र में 20 अगस्त 1944 को भारत के विकसित राजनैतिक परिवार में हुआ ।भारत की आज़ादी की लड़ाई में राजीव गांधी के दादा जवाहर लाल नेहरू की मुख्य भूमिका रही और बाद में आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने ।राजीव गांधी के माता पिता दोनों अलग रहते थे इस कारण उनका रहन सहन उनके दादा के घर पर हुआ। जहां उनकी मां इंदिरा गांधी उनके साथ रहती थी । प्रारंभिक शिक्षा राजीव की चर्चित स्कूल दून से पूरी हुई और उच्च शिक्षा के लिए लंदन यूनिवर्सिटी ट्रिनिटी कॉलेज और कैम्ब्रिज से पढ़ाई की।

पढ़ाई के दौरान राजीव गांधी की मुलाकात एंटोनिया माइनो से हुई और बाद में मुलाकात प्रेम में बदल गई और सन 1969 में दोनों ने शादी कर ली ।शादी के बाद उन्होंने अपनी धर्म पत्नी एंटोनिया माइनो का नाम बदल कर सोनिया गांधी रखा ।राजीव गांधी के दो बच्चे हुए प्रियंका और राहुल ।सोनिया गांधी वर्तमान समय (2020) में भारतीय कांग्रेस की अध्यक्ष हैं।और राहुल गांधी सांसद के रूप में राजनीति में कार्यरत हैं।

कैरियर
राजीव गांधी भारत लौटने के बाद कमर्शियल एयर लाइन में पायलट बने । दूसरी तरफ उनके छोटे भाई संजय राजनीति में सक्रिय हो चुके थे ।और इंदिरा गांधी के भरोसेमंद प्रतिनिधि बन चुके थे ।संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद 1980 में बिना इच्छा व्यक्त किए राजीव गांधी ने मां के कहने पर राजनीति में कदम रखा ।

राजीव गांधी ने अपने भाई संजय के पूर्व संसदीय सीट अमेठी से अपना लोकसभा चुनाव जीता ।और बहुत जल्द कांग्रेस का महासचिव पद संभाला ।1984  में इंदिरा गांधी के दो अंगरक्षक द्वारा उनको गोली से मार दिया ।उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया ।आम चुनावों में 1984 में आवाहन किया और सहानुभूति की लहर पर अपनी पार्टी कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल करवाई।निचले सदन की 80 प्रतिशत सीट जीत कर कांग्रेस  ने स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ी जीत दर्ज की ।

शुरुआती दिनों में राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद के रूप में काफी लोकप्रिय थे ।अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री पद में थोड़ी गतिशीलता लेकर आए । भारत में कंप्यूटर और टेली कम्युनिकेशन की शुरुआत का श्रेय उन्हें ही जाता हैं। इंदिरा गांधी के समाजवादी राजनीतिक उसूलों से हटकर अलग दिशा में देश का मार्गदर्शन किया । उन्होंने अर्थिंक और वैज्ञानिक सहयोग का विस्तार करके अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों में  सुधार किया ।उन्होंने टेक्नोलॉजी, विज्ञान , कंप्यूटर,मास मीडिया , संबधित उद्योगों पर ध्यान दिया और विशेष रूप से टेक्नोलॉजी पर आधारित कंप्यूटर ,बैंक, एयरलाइंस,रक्षा अनुसंधान और दूरसंचार पर आयात किया,शुल्क और करों को कम किया ।उन्होंने प्रशासन को नौकरशाही घपलेबाजों  से बचाने और दफ्तरशाही शासन को कम करने की दिशा में काम किया ।उच्च शिक्षा के कार्यक्रमों के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए राजीव गांधी ने भारत भर में 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की।

पंजाब में अलगाववादी ताकतों के खिलाफ राजीव गांधी ने व्यपाक पुलिस और सेना अभियान चलाया । एल टी टी ई विद्रोहियों और श्रीलंका के बीच शांति वार्ता के प्रयासों का उल्टा असर हुआ और कांग्रेस सरकार को एक बड़ी असफलता का सामना करना पड़ा । एल टी टी ई आंतकवादीओं और भारतीय सैनिकों के बीच अविश्वास और संघर्ष एक खुली जंग के रूप में बदल गया । सैंकड़ों हज़ारों सैनिक मारे गए और भारतीय सेना को श्रीलंका से राजीव सरकार में वापिस बुला लिया ।ये फैसला राजीव सरकार का एक कूटनीतिज्ञ विफलता के रूप में सामने आया ।

राजनीति के दौर में हर एक नेता भ्रष्टचार ख़तम करने की बात करता ही करता है।ठीक राजीव गांधी ने भी ये वादा जनता से किया था हालांकि उनकी पार्टी पर खुद भ्रष्टचार धांधली के कई आरोप लगे । सबसे ज्यादा चर्चित घोटाला स्वीडिश बोफोर्स हथियार कंपनी द्वारा कथित भुगतान से लिंक्ड *बोफोर्स तोप घोटाला * था । घोटाले के मामले में उनकी लोकप्रियता बहुत तेजी से जनता में कम हुए और 1989 के आम चुनावों में हार मिली ।उस समय की गठबंधन के साथ सत्ता में आई सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और 1991 के लोकसभा चुनाव करवाएं गए ।तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में 21 मई 1991 चुनाव प्रचार के दौरान एल टी टी ई के आंतकवादी हमलावरों ने राजीव गांधी की हत्या कर दी।

आरोप और आलोचना
(1)64 करोड़ बोफोर्स घोटाले का आरोप जिसके बाद उनको प्रधानमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा ।
(2) ढाई बिलियन स्विस फ्रैंक काले धन का स्विस बैंकों में रखने का आरोप schwieizer illustrierte नामक पत्रिका ने लगाया लेकिन साबित नहीं हो पाया ।
(3) वारेन एंडरसन को रिश्वत लेकर देश से फरार करने का आरोप लगाया जो भोपाल गैस काण्ड का आरोपी था।
(4)टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार सोवियत संघ “के जी बी ” गुप्तचर संस्था ने राजीव को धन मुहैया कराया था ।
(5) सिक्खों के संदर्भ में एक वक्तव्य देने की कड़ी आलोचना हुई थी “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती तो हिलती है।”
ये जानकारी विकिपीडिया से ली गई हैं।

सी बी आई के संदर्भ में आलोचना
सी बी आई कि जिस तरह से भूमिका रही हैं उस संदर्भ में राजनैतिक दलों, समाजिक कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों ,और लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर आलोचना की गई है।
(1)प्रथम सूचना रिपोर्ट में देरी
(2)अनुरोध पत्र में डील
(3)दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध 2004 में अपील न करना ।
(4)कात्रोची के प्रत्यर्पण के लिए अर्जेंटीना से कमजोर केस बनाना ।
(5)निचली अदालतों के फैसले पर कोई टिप्पणी (अपील) न करना
(6)इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस को रिटर्न लेना।
(7)कात्रोची के खिलाफ मुकदमे को वापस लेना ।

राजीव गांधी की वीडियो में बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

लेख के संदर्भ में आपका कोई सुझाव या विचार मन में हो तो कृपया कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें

इंदिरा गांधी की जीवनी , परिचय, निबंध,हिंदी – Indira Gandhi biography,Early Life, introduction in Hindi

इंदिरा गांधी की जीवनी , परिचय, निबंध,हिंदी – Indira Gandhi biography,Early Life, introduction in Hindi

जन्म – इलाहाबाद, भारत , 19 नवंबर 1917
मृत्यु- नई दिल्ली ,31 अक्टूबर 1984
कार्य पद – राजनेता, भारत की अभी तक पहली और आखिरी महिला प्रधानमंत्री।
जन्मस्थान – इलाहाबाद , उत्तरप्रदेश ,इंडिया
माता- कमला नेहरू
पिता -जवाहर लाल नेहरू
पति – फिरोज़ गांधी
पुत्र- राजीव गांधी और संजय गांधी
पुत्र वधुएं – सोनिया गांधी और मेनका गांधी
पौत्र – राहुल गांधी और वरुण गांधी
पौत्री – प्रियंका गांधी

इंदिरा गांधी भारत में पहली और आखिरी अभी तक प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त की गई “महिला” हैं। इंदिरा गांधी भारत की चौथी प्रधानमंत्री रही । इनका प्रधानमंत्री बनने का सफर  ना   केवल  प्रेरणादायक हैं  बल्कि  महिला सशक्तीकरण के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय भी हैं ये   एक  ऐसी  प्रभावित महिला  थी  जिसने भारतीय राजनीति के साथ साथ विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी विलक्षण प्रभाव डाला। इसलिए उन्हें लौह महिला के नाम से भी याद किया जाता है।इंदिरा, पंडित नेहरू की इकलौती  बेटी  थी पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए इंदिरा ने सरकार के अंदर अच्छी  खासी  पैठ  बना  ली थी ।इंदिरा  गांधी को राजनीतिक दृष्टि से निष्ठुर माना जाता है। प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने प्रशासन  का  जरूरत से ज्यादा  केंद्रीयकरण  किया ।भारत  में  एकमात्र आपातकाल उनके शासनकाल में लागू किया गया और सभी राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को जेल में बंद कर दिया गया । इंदिरा गांधी की सरकार में जितना भारत के संविधान के मूल  स्वरूप का  संशोधन उनकी सरकार में हुआ ।ऐसा पिछली सरकारी में कभी नहीं हुआ था ।
बंगलादेश मुद्दे पर भारत पाकिस्तान युद्ध हुआ और बांग्लादेश का जन्म उनके शासन काल के दौरान ही हुआ जब अमृतसर में  सिक्खों  के  पवित्र   स्थल “स्वर्ण मंदिर” में सेना और सुरक्षावलो के द्वारा आंतकवाद का सफाया करने का हवाला देकर “ऑपरेशन ब्लू स्टार” को अंजाम दिया ।बाद  में उनके  अंगरक्षकों ने कुछ महीनों बाद इस विवाद के चलते उनकी हत्या कर दी ।
इंदिरा गांधी अपनी राजनैतिक दृढ़ता और प्रतिभा के लिए भारतीय इतिहास में महिला प्रधानमंत्री पद पर हमेशा याद की जाएगी।

प्रारंभिक जीवन

19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में प्रसिद्द नेहरू वंश में इंदिरा गांधी का जन्म हुआ ।उन्हें “इंदिरा प्रिदर्शिनी ” नाम से पुकारा जाता था ।उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरु और दादा मोतीलाल नेहरू थे । पेशे से  परिवार  सफल  वकील श्रेणी में विख्यात था । जवाहर  लाल  नेहरू और मोतीलाल नेहरू दोनों का स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान रहा ।इंदिरा की मां का  नाम कमला नेहरू था ।उनका परिवार आर्थिक रूप और बौद्धिक दोनों दृष्टि से बहुत उज्जवल और  संपन्न था इंदिरा  का नाम उनके दादा मोतीलाल नेहरू ने रखा था ।


दिखने में इंदिरा गांधी बहुत प्रिय थी इसलिए इंदिरा का नाम पंडित नेहरू ने प्यार से “प्रियदर्शनी” रखा था। मां- बाप का आकर्षक व्यक्तित्व और पहचान इंदिरा को विरासत में मिला ।लेकिन इंदिरा को बचपन में पारिवारिक जीवन स्थिर नहीं मिल पाया । क्योंकि पिता  स्वतंत्रता  सेनानी  थे  हमेशा  ज्यादा समय स्वतंत्रता आंदोलन में  व्यतीत करते थे और माता कमला नेहरू भी तपेदिक से ग्रसित चल बसी ।तब इंदिरा मात्र 18 साल की थी ।

मां के खराब स्वास्थ्य और पिता के राजनैतिक जीवन के चलते इंदिरा के जन्म के कुछ साल बाद भी शिक्षा का अनुकूल माहौल उपलब्ध नहीं हो पाया था । रात दिन राजनैतिक लोगों की आवाजाही के चलते घर का वातावरण  भी  पढ़ाई  के   लिए  अनुकूल  नहीं था ।इसलिए  ये  सभी  परिस्थितियों को नजर रखते हुए पंडित  नेहरू  ने उनके शिक्षा  के लिए  घर पर ही शिक्षकों का प्रबंध कर दिया था ।

इंदिरा अंग्रेज़ी के आलावा और किसी अन्य विषय में कोई विशेष दक्षता प्राप्त नहीं कर सकी ।इसलिए बाद में उनको “शांति निकेतन “के  विश्व भारती  में भेजा गया ।जिसे रवीन्द्र नाथ टैगोर ने स्थापित किया था ।
उसके बाद उन्होंने  बैडमिंटन स्कूल ऑफ ऑक्सफोर्ड लंदन में अध्ययन किया लेकिन औसत दर्ज की छात्रा होने पर वहां भी विशेष दक्षता नहीं दिखा पाई।

इंदिरा की मुलाकात  फिरोज  गांधी से  ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अध्ययन के दौरान अक्सर होती रहती थी ।फिरोज गांधी लंदन स्कूल ऑफ इकोनमिक्स में पढ़ाई कर रहे थे ।इंदिरा फिरोज को इलाहाबाद से ही जानती थी ।वापिस भारत लौटने पर दोनों का विवाह 16 मार्च 1942 को आनंद भवन , इलाहाबाद में संपन्न हुआ ।
राजनैतिक जीवन
जवाहर लाल नेहरू को अंतरिम सरकार के गठन के साथ कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिया गया था ।इसके बाद राजनैतिक सक्रियता नेहरू जी की ज्यादा बड़ गई थी ।नेहरूजी जी के निवास स्थान त्रिमूर्ति भवन पर सभी आगंतुकों का स्वागत इंदिरा द्वारा ही किया जाता था ।नेहरू   जी की  उम्र को  देखते हुए सारी जिम्मेवारी इंदिरा  पर आ  गई और  नेहरू की पूरी देखभाल , कामकाज और नर्स के साथ उनकी सचिव बनी ।
राजनीतिक विचारधारा इंदिरा को विरासत में परिवार से ही मिली और राजनीति की भी अच्छी समझ पिता की मदद करते करते हो गई ।1955 में ही इन्हें कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी में  शामिल  कर लिया था ।राजनीतिक परामर्श और जानकारी इनसे बताते थे और उस पर अमल भी करते थे ।
मात्र 42 साल की उम्र में राजनीति के सफर में इंदिरा ने अपने पिता की राजनैतिक पार्टी में कदम रखा और 1959    में कांग्रेस  की   अध्यक्ष  बनी। नेहरू  की शख्शियत इतनी मजबूत थी कि कुछ लोगों ने पार्टी पर परिवारवाद फैलाने का आरोप भी लगाया लेकिन इन बातों का उन पर कोई असर नहीं हो पाया।नेहरू के निधन के बाद 1964 में चुनाव जीतकर शास्त्री की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनी।अपने इस पद के दायित्व का  निर्वहन  बड़ी कुशलता के साथ किया और सूचना एवं प्रसारण मंत्री के तौर तरीकों को ध्यान  में  रखते हुए  आकाशवाणी  के कार्यक्रमों को मनोरंजक  बनाया  और  गुणात्मक  सुधार  किए। आकाशवाणी ने राष्ट्र की एकता और अखंडता को मजबूत करने में  अतुलनीय योगदान दिया और भारत पाकिस्तान के युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी ने सीमाओं पर जाकर जवानों का मनोबल ऊंचा किया और अपने विचारो के साथ अपने नेतृत्व के गुणों को दर्शाया।

स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी
बचपन से  ही  इंदिरा ने  अपने  घर  पर राजनैतिक माहौल देखा था उनके  परिवार से  उनके पिता और दादा दोनों स्वतंत्रता आंदोलन के मुख्य नेताओं में से एक थे इन बातों का असर इंदिरा पर भी पड़ा ।उन्होंने वानर सेना बनाई जिसमें लड़के लड़कियों को इकट्ठा करके झंडा जुलूस के साथ साथ विरोध प्रदर्शन और संवेदनशील प्रकाशनों और प्रतिबंधित सामग्रियों का परिसंचरण  भी करती थी ।अपने  पढ़ाई  के  दौरान लंदन में इंडियन लीग की मेंबर बनी।1941 में इंदिरा ऑक्सफोर्ड से  वापिस लौट  आई।आने के पश्चात भारतीय स्वन्त्रता आंदोलन से जुड़ गई ।और 1942 आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिए गया बाद में सरकार ने 1943 में रिहा किया ।
इंदिरा ने एक महत्त्वपूर्ण कार्य विभाजन के बाद जो किया,, वो  दंगे और अराजकता के दौरान शरणार्थी शिविरों को एकजुट करके तथा पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की देखभाल की।

प्रधानमंत्री पद
(1)इंदिरा गांधी भारत की अभी तक की पहली और आखिरी महिला प्रधानमंत्री रही।
(2)लगातार 3 बार (1966 से 1977) और बाद में चौथी बार (1980 से 1984)
(3)भारत में द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मृत्यु के बाद सन् 1966 में श्रीमति इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री चुनी गईं।
(4)दूसरी बार बहुत कम बहुमत से 1967 में प्रधानमंत्री बनी
(5)तीसरी बार 1971 में भारी बहुमत से इंदिरा की सरकार बनी।
(6)और चौथी भार फिर से 1980 से 1984 तक प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत रही ।

कांग्रेस अध्यक्ष के कामकाज को संभालते हुए लाल बहादुर    शास्त्री  के  मृत्यु  के बाद इंदिरा का नाम प्रधानमंत्री   पद के  लिए चुना  लेकिन  वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई ने भी अपना नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया।इस गतिरोध को कांग्रेस संसदीय पार्टी द्वारा मतदान के माध्यम से सुलझाया गया और भारी  मतों से   इंदिरा गांधी विजयी हुए ।और इसके साथ  ही   इंदिरा  गांधी ने 24  जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की ।कांग्रेस को 1967 के इलेक्शन  में भारी  नुकसान हुआ लेकिन सरकार बनाने में कामयाब रहे ।दूसरी तरफ मोरारजी देसाई के निर्देशन में एक खेमा इंदिरा गांधी का लगातार विरोध प्रदर्शन करता रहा जिसके कारण कांग्रेस का 1969 में विभाजन हो गया ।
इंदिरा ने 19 जुलाई 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया ।

1971 के मध्यावधि चुनाव

अपनी स्थिति मजबूत बनाने के लिए दोनों तरफ देश और    पार्टी  में इंदिरा  गांधी ने  लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी ।जिसके कारण विपक्ष दल आश्चर्य में रह गया ।गरीबी हटाओ के नारे के साथ इंदिरा  गांधी  चुनावी  मैदान में उतरी ।और चुनावी माहौल उनके साथ दिखने लगा और कांग्रेस को 518 में से 352 सीटें मिली और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई।
चुनाव के परिणाम आने के बाद ये साफ हो गया था कि जनता ने अन्य दलों को नकार दिया था अब इंदिरा गांधी की स्थिति केंद्र  में मजबूत हो चुकी थी और वे अपने सोच समझ  और विचार करके स्वतंत्र फैसले लेने के लिए आज़ाद थी।

पाकिस्तान के साथ युद्ध
बांग्लादेश के मुद्दे पर 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध छिड़ा और  पाकिस्तान  को एक बार फिर से मुंह की खानी पड़ी ।भारत की सेनाओं ने 13 दिसंबर , ढाका को सभी तरफ से घेर लिया । जनरल नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ 16 दिसंबर को हथियार डाल दिए ।करारी हार के बाद पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति जुल्फिकार अली  भुट्टो  बने जिन्होंने भारत के सामने शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा जिसे इंदिरा गांधी ने मान लिया और  स्वीकार  करते  हुए दोनों देशों में शिमला समझौता हुआ ।

इंदिरा।  गांधी  ने  सोवियत  संघ से  मित्रता की और आपसी सहयोग बढ़ाया और अमेरिकी खेमे में शामिल नहीं हुई।  1971  में जिसके  परिणामस्वरूप युद्ध में भारत की   जीत  में सैन्य समर्थन और राजनैतिक सहयोग का पर्याप्त योगदान रहा ।

इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के युद्ध के बाद अपना पूरा ध्यान देश के विकास की ओर लगा दिया । लोकसभा चुनाव    में उन्हें पूर्ण बहुमत मिला था जिसके कारण उन्हें    निर्णय    लेने में आज़ादी थी 1972 में उन्होंने कोयला उद्योग  और बीमा कंपनी का राष्ट्रीयकण कर दिया ।ये फैसले जनता के द्वारा पूर्ण रुप से सराहे गए और अपार जनसमर्थन मिला ।इसके अलावा उन्होंने समाज  कल्याण ,भूमि सुधार ,और अर्थ जगत में भी बहुत सुधार किए ।

आपातकाल (1975-77)
इंदिरा   गांधी   की सरकार  को 1971 के लोकसभा चुनाव में भारी सफलता मिली थी और उन्होंने अनेक क्षेत्रों में  विकास  के नए काम करने भी शुरू किए थे लेकिन  इसके  बावजूद  भी देश  के अंदर  समस्याएं उत्पन्न होती जा रही थी ।लोग मंहगाई को लेकर थक चुके थे ।युद्ध के चलते आर्थिक बोझ के दबाव से भी आर्थिक समस्याएं बढ़ गई थी ।इसी दौरान सूखा और अकाल  प्रभावित  इलाकों  में स्थिति और बिगड़ गई थी।साथ  में  पेट्रोल और  डीजल  के दामों को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार से भारत में मेहंगाई बढ़ती जा रही थी।और सुमचे देश का विदेशी मुद्रा भंडार पेट्रोलियम आयात करने के रूप में तेजी से कम होता जा रहा था ।कुल मिलाकर  देखते  तो आर्थिक मंदी का जोर चल रहा था ।जिसमें  उद्योग धंधे ख़त्म होने की कगार पर थे और   बेरोज़गारी    आसमान छू रही थी ।साथ में सरकारी बाबू मेहंगाई भत्ता बढ़ाने की मांग कर रहे थे। इन सभी समस्याओं के चलते सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप  लगने शुरू हो गए थे।

इंदिरा गांधी की सरकार इन सभी समस्याओं से जूझने के साथ साथ ,इसी दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने   इंदिरा   गांधी  के  चुनाव  से जुड़े हुए मुकदमे पर फैसला सुनाते हुए इंदिरा का चुनाव रद कर दिया ।ये प्रतिबंध 6 सालों के लिए सुनाया गया ।इस फैसले के खिलाफ इंदिरा ने  सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की और न्यायालय ने चौदह जुलाई का दिन तय किया लेकिन विपक्षी  दलों   और नेताओं को चौदह जुलाई तक का समय गवारा नहीं लगा । विपक्ष के नेता जय प्रकाश नारायण  और अन्य  नेताओं ने आंदोलन को डरावना रूप  देकर, उग्र आंदोलन खड़ा कर दिया । इन आंदोलन और परिस्थितियों को देखते हुए काबू में करने  के  लिए   26 जून 1975 को सुबह देश में आपातकाल की घोषणा जारी कर दी।और इस प्रकार मोरारजी  देसाई ,   जय प्रकाश नारायण   और अन्य सैकड़ों हज़ारों।   नेताओं को गिरफ्तार कर के जेल में बंद कर दिया गया ।
लगभग मौलिक अधिकार समाप्त होने के साथ साथ सरकार ने रेडियो , अखबार,टीवी सभी मास मीडियम पर सेंसर लगा दिया ।

1977 में सरकार ने जनवरी महीने से लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की और साथ में ही राजनैतिक दलों के नेताओं की रिहाई हो गई ।एक बार फिर से मीडिया की आज़ादी  बहाल  हो  गई।चुनाव प्रचार और राजनीति सभाओं की स्वतंत्रता दे दी गई ।

समय   के   साथ   शायद इंदिरा  गांधी स्थिती का मूल्यांकन सही से नहीं कर पाई। जनता का विश्वास और समर्थन अब विपक्ष को मिलने लगा और इसी कारण विपक्ष पहले से ज्यादा सशक्त होकर जनता के सामने उबर  कर आयी।एकजुट विपक्ष और उसके सहयोगी  दलों को “जनता पार्टी” के  रूप में 542 सीटों में से 330 सीटें प्राप्त हुए ।जबकि कांग्रेस पार्टी को कुल 154 सीटें मिली और जोरदार हार हुई।

अटल बिहारी वाजपेई की जीवनी पढ़े ।


इंदिरा सरकार की वापिसी
जनता पार्टी ने 23 मार्च 1977को मोरारजी देसाई के नेतृत्व में   सरकार   बनाई  लेकिन आंतरिक कलह से जूझती अगस्त 1979 में सरकार गिर गई ।
इंदिरा गांधी पर जनता पार्टी के शासनकाल में अनेक तरह के आरोप लगाए गए, कई कमीशन जांच के लिए बैठाए गए।देश की विभिन्न अदालतों में इनके खिलाफ मुकदमे चलाए गए।और इंदिरा गांधी सरकारी भ्रष्टचार के घेरे में कुछ समय के लिए जेल में भी रही ।

जनता पार्टी के आंतरिक कलह के कारण उनकी सरकार सभी मोर्चों  पर असफल हो रही थी और दूसरी तरफ इंदिरा गांधी पर हो रहे अपमानजनक व्यवहार से    जनता   की निगाहें इंदिरा की तरफ सहानुभूति बटोर रही थी ।

सरकार चलाने में जनता पार्टी पूरी तरह से आंतरिक कलह के कारण असफल रही और इसी दौरान देश को मध्यावधि चुनाव का बोझ झेलना पड़ा । आपातकाल के लिए इंदिरा गांधी ने जनता से माफी मांगी और जिसके कारण कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत लेकर 592 में  से 353 सीटों पर कब्जा करके पुनः सरकार बनाने में सफल रही।और इंदिरा गांधी चौथी बार देश की प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुई।

1984 ,ऑपरेशन ब्लू स्टार और हत्या
पंजाब में अलगाववादी ताकते खुल कर सामने आने लगी   और   भिंडरावाले  के नेतृत्व में ये ताकते सिर उठाने लगी और भिंडरावाले को लगा कि वो पंजाब में अलग अस्तिव कायम कर देगा ।जब ऐसा प्रतीत हुआ कि स्थिति   बहुत  बिगड़  गई है और  केंद्र सरकार के हाथ से भी   नियंत्रण  निकलता नजर आ रहा था तब भिंडरवाले को गलतफहमी    के चलते    लगा  कि हथियारों के बल प्रयोग से अलग अस्तित्व कायम कर लेगा ।

भिंडरावाले का आतंकवादी समूह 1981 में हरमिंदर साहिब   परिसर में दाखिल  हो गया ।इंदिरा  गांधी ने सेना बल को धर्मस्थल के अंदर आंतकवादी समूह का सफाया  करने के  लिए प्रवेश के आदेश दे दिए और इस ऑपरेशन  कार्यवाही के दौरान हजारों जाने गई इंदिरा  गांधी के  खिलाफ  सिक्ख  समाज  का घोर आक्रोश पैदा हुआ।

ठीक   ऑपरेशन ब्लू  स्टार के 5 महीने बाद ही इंदिरा गांधी को 31 अक्टूबर 1984 को दो सिक्ख अंगरक्षक बित सिंह और सतवंत सिंह ने गोली मारकर हत्या कर दी थी ।
अवॉर्ड और सम्मान
1953* यू. एस. ए. में मदर्स अवॉर्ड ।

1971*भारत रत्न से सम्मानित ।
1972 *मेक्सिकन अवॉर्ड से नवाजा गया ।
1973 *सेकंड एनुअल मेडल एफ ए ओ ।
1976 *हिंदी में साहित्य वाचस्पति अवॉर्ड।


इंदिरा गांधी के नाम धरोहर
इंदिरा गांधी के। नाम से विभिन्न प्रकार के स्कूल , कॉलेज ,यूनिवर्सिटी , एयरपोर्ट, समुद्री ब्रिज,और शहरों सड़कों, चौराहों के नाम रखे गए हैं

जिसमें कुछ मुख्य रूप से इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (ई ग्र), इंदिरा गांधी नेशनल टाइब्ल युनिवर्सटी (अमरकंटक) इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस,इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च ( मुंबई ) इत्यादि कई संस्थाएं हैं।
भारत की राजधानी दिल्ली के एयरपोर्ट का नाम भी इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली हैं।

इंदिरा गांधी की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जीवन परिचय देखें

आर्टिकल से संबधित अपना सुझाव और विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें ।

अटल बिहारी वाजपेई की जीवनी, परिचय,हिंदी -Biography of Atal Bihari Vajpayee and Early Life in Hindi

अटल बिहारी वाजपेई की जीवनी, परिचय,हिंदी -Biography of Atal Bihari Vajpayee and Early Life in Hindi

पुरस्कार और सम्मान

(1)1992 में देश की अभूतपूर्व सेवाओं के लिए “पद्म विभूषण ” सम्मान ।
(2)1993 ,कानपुर यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि का सम्मान।
(3)1994 , लोकमान्य तिलक अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
(4)1994 ,पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से नवाजा गया।
(5)1994, सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान।
(6)2015,देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार”भारत रत्न” से नवाजा ।
(7)2015,बांग्लादेश द्वारा “लिब्रेशन वार अवॉर्ड ” दिया गया ।

अटल बिहारी वाजपेई जीवन भर राजनीति में सक्रिय रहे । पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद एकमात्र ऐसे नेता रहे जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला ।वे भारत के सबसे प्रेरक और सम्माननीय राजनीतिज्ञो में से एक रहे ।अटल जी ने विभिन्न परिषदों और संगठनों के मेंबर के तौर पर अपनी भूमिका निभाते हुए सेवाएं दी।अटल जी प्रखर वक्ता और प्रभावशाली कवि थे ।एक बड़े नेता के तौर पर वे अपनी लोकतांत्रिक, साफ़ छवि और उदार विचारों के लिए जाने गए।अटल जी को 2015 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान”भारत रत्न” से नवाजा गया ।

प्रारंभिक जीवन

25 दिसंबर 1924 को अटलजी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ ।वे सात भाई – बहन थे उनकी माता का नाम कृष्णा देवी और पिता का कृष्ण बिहारी था ।उनके पिता विद्वान और स्कूल शिक्षक थे अटल जी अपनी स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद लक्ष्मीबाई कॉलेज  और डी. ए.वी  कॉलेज कानपुर आ गए ।यहां से इन्होंने इकोनॉमिक्स सबजेक्ट में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। उन्होंने लखनऊ से आगे की पढ़ाई के लिए आवेदन भरा लेकिन पढ़ाई जारी नहीं कर पाए ।बाद में इन्होंने बतौर संपादक आरएसएस द्वारा प्रकाशित पत्रिका में नौकरी की । हालांकि अटल जी ताउम्र अविवाहित रहे ।उन्होंने बी एन कौल की दो बेटियों नंदिता और नमिता को गोद लिया ।

Arunsandhu.com
Source-wikipidia

करियर

अटल जी ने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपनी  राजनैतिक यात्रा का शुभारंभ किया ।भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लेने पर 1942 में अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिए गए।श्यामा प्रसाद मुखर्जी से पहली मुलाकात उनकी इसी दौरान हुए ।जो बी जे एस के नेता यानी भारतीय जनसंघ के नेता थे।अटल जी ने उनके राजनैतिक एजेंडे में सहयोग दिया । स्वास्थ्य संबंधी समस्या के चलते मुखर्जी का निधन हो  गया ।बाद में बी जे एस का कार्यकाल अटल जी के कंधों पर आ गया और इस संगठन के एजेंडे और विचारों को आगे बढ़ाया ।लोकसभा चुनावों में बलरामपुर सीट से1954 में संसद सदस्य निर्वाचित हुए । विस्तृत नजरिए और राजनीतिक जानकारी ने उन्हें छोटी उम्र में राजनीति जगत में सम्मान और पहचान दिलाने में मदद की। जब मोरारजी देसाई की सरकार 1977 में बनी तो अटल जी को विदेश मंत्री का पद दिया गया । दो साल बाद अटल जी ने चीन की यात्रा की ।यात्रा का मकसद चीन सम्बन्धों पर चर्चा करना था।1971 में भारत- पाक के युद्ध के कारण प्रभावित व्यापारिक संबंधों को सुधारने के लिए पाकिस्तान की भी यात्रा की। आरएसएस पर जब जनता पार्टी ने हमला किया तब अटल जी ने 1979 में मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया ।

Arunsandhu.com
Source-wikipidia

अटल जी व आरएसएस से आए लाल कृष्ण आडवाणी तथा बीजेएस और भैरों सिंह शेखावत व अन्य साथियों ने सन् 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी । पहले पांच साल “स्थापना के” अटल जी खुद बीजेपी के अध्यक्ष रहे ।।
भारत में प्रधानमंत्री के तौर पर
लोकसभा चुनाव के बाद सन 1996 में बीजेपी को सत्ता में आने का मौका मिला और अटल जी प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।लेकिन कुछ दिनों में ही बहुमत सिद्ध न कर पाने पर सरकार गिर गई और अटल जी को मात्र 13 दिनों के अंदर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा ।
एक बार फिर बीजेपी 1998 में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने पर सरकार बनाने में कामयाब रही।लेकिन इस बार सरकार तेरह महीनों तक चल सकी।क्यूंकि अपना समर्थन वापिस लेते हुए आॅल इंडिया द्रविड़ मुनेन काजगम पार्टी ने सरकार गिरा दी।अटल जी के योगदान और नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने  राजस्थान के पोखरण में मई 1998 में परमाणु परीक्षण कराए।
एनडीए(नेशनल डेमक्रेटिक एलायंस ) को 1999 लोकसभा चुनाव में सरकार बनाने की सफलता प्राप्त हुई और अटल जी एक बार फिर प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए ।इस बार पूरे पांच साल पूरे करने पर एनडीए पार्टी  पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी ।अटल जी ने निजी   क्षेत्र और आर्थिक सुधार के लिए सहयोगी दलों के मजबूत समर्थन से कई योजनाएं शुरू की। औद्योगिक क्षेत्र में अटल जी ने राज्यों के दख़ल को सीमित करने का प्रयास किया ।सूचना तकनीकी और विदेशी निवेश की दिशा में अटल जी ने शोध को बढ़ावा दिया ।भारत की अर्थव्यवस्था पर अटल जी ने नई नीतियों और विचारों के परिणाम स्वरूप त्वरित विकास हासिल किया । यू एस ए और पाक के साथ दोस्ताना व्यवहार कायम करके अपनी सरकार में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत किया ।हालांकि विदेश नीतियों पर अटल जी की सरकार ज्यादा बदलाव नहीं ला सकी लेकिन फिर भी इन नीतियों की सराहना हुई।
एनडीए के पूरे पांच साल होने के बाद पूरे आत्मविश्वास के साथ अटल जी के नेतृत्व में लोकसभा चुनावों में बीजेपी एक बार फिर चुनाव में उतरी लेकिन इस बार यूपीए (कांग्रेस) ने सफलापूर्वक अपनी सरकार बनाई ।
और इसके साथ ही अटल जी ने सक्रिय राजनीति से दिसंबर 2005 में संन्यास लेने की घोषणा कर दी।
व्यक्तिगत जीवन
अटलजी समस्त जीवन में अविवाहित रहे और उन्होंने बी एन कौल की बेटी नमिता भट्टाचार्य को गोद लिया था ।

मृत्यु
अटल जी एक बार 2009 में दिल का दौरा पड़ने से जूझ चुके थे जिसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता रहा । ग्यारह जून 2018 को उन्हें एम्स (अखिल भारतीय आयु्विज्ञान संस्थान) में भर्ती किया गया था । सोलह अगस्त 2018 को अटलजी परलोक सिधार गए । सत्रह अगस्त को उनकी मुंह बोली बेटी नमिता कौल ने उन्हें मुखाग्नि दी।राजघाट के नजदीक शांति वन में स्मृति स्थल में उनकी समाधि बनाई गई हैं।

जीवन घटनाक्रम (टाइमलाइन)
1924 * अटल जी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ ।
1942 *भारत छोड़ो आन्दोलन में भागीदारी ।
1957 *लोकसभा सीट के लिए चुने गए ।
1980 *बीजेपी की स्थापना ।
1992 *पद्म विभूषण सम्मान।
1996 * प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त।
1998 *दूसरी बार प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत।
1999 *तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने।
2005 *राजनीति से सन्यास ।
2015 *भारत रत्न से सम्मानित।
2108 *11 जून ,2018 , मृत्यु

अटल जी का कविता सग्रह से दिखाई गई एक कविता

अरूण कुमार
Source: Kavita sangrah

अटल जी की वीडियो बायोग्राफी देखने के लिए क्लिक करें ।

पंडित जवाहरलाल नेहरु का जीवन परिचय,जीवनी,हिंदी, Biography of Jawaharlal Nehru in Hindi

पंडित जवाहरलाल नेहरु का जीवन परिचय,जीवनी,हिंदी, Biography of Jawaharlal Nehru in Hindi

नाम – जवाहर लाल मोतीलाल नेहरू।

जन्म– चौदह नवंबर 1889 , इलाहाबाद,भारत ।

मृत्यु -27 मई1964 (उम्र 74 साल ) नई दिल्ली, भारत।

पिता – मोती लाल नेहरु ।

माता- स्वरूप रानी नेहरू।

विवाह – कमला नेहरू ।

उपलब्धियां

पंडित जवाहरलाल नेहरू असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदार रहे , इलाहाबाद में 1924 नगर निगम अध्यक्ष चुने गए और शहर के प्रमुख कार्य अधिकारी के रूप में अपना योगदान दिया उसके बाद 1929 में कांग्रेस के  लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए आजादी की मांग का प्रस्ताव पारित किया और 1946 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए बाद में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने । पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले नेताओं में सबसे आगे रहे आजादी के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने पंडित जवाहर नेहरू को भारत के आधुनिक समय में भारत के निर्माता के रूप में जाना जाता है ।पंडित नेहरू को बच्चो से बहुत लगाव और प्रेम था इसलिए बच्चे उन्हें चाचा नेहरू बोला करते थे ।

प्रारंभिक जीवन

14 नवंबर 1889 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ ।इनके पिता मोतीलाल नेहरू एक प्रसिद्ध वकील इलाहाबाद में कार्यरत थे उनकी माता का नाम स्वरूपरानी था पंडित जवाहरलाल नेहरू मोतीलाल नेहरू के इकलौते उत्तराधिकारी थे पंडित नेहरू की तीन बहनें थीं और इनका परिवार कश्मीरी वंश में सारस्वत ब्राह्मण समाज का था ।
पंडित नेहरू ने अपनी शिक्षा दुनिया के सबसे अच्छे स्कूलों और कॉलेजों से ग्रहण की ।उन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा हैरो से की और ग्रेजुएशन कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी लॉ ऑफ कॉलेज से डिग्री पूरी की ।इंग्लैंड में रहकर वहां पर सात सालों मे पंडित नेहरू ने फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए तर्कसंगत सोच ओर दृष्टिकोण विकसित किया ।

करियर

1912 में पंडित नेहरू भारत लौट आएं और यहां वकालत की शुरुआत की ।1916 में नेहरू जी का विवाह कमला नेहरू से हुआ । 1917 में नेहरू होम रूल लीग से जुड़ गए ।राजनीत की असली शुरुआत 1919 में हुई जब पहली बार महात्मा गांधी के संपर्क में आए ।उस समय रॉलेट अधिनियम के खिलाफ महात्मा गांधी एक अभियान चला रहे थे ।उस समय गांधी के “सक्रिय और शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा आन्दोलन” के प्रति पंडित नेहरू अच्छे खासे प्रभावित हुए ।
पंडित जवहरलाल नेहरू में गांधी जी ने पहली बार स्वयं कल्पना करते हुए आशा की एक किरण और भारत का भविष्य देखा ।
नेहरू परिवार ने अपने आप को गांधी जी द्वारा दी गई दिक्षाओं के हिसाब से खुद को मजबूत किया और इसके साथ ही मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू ने पश्चिमी लिवास और महंगी चीज़ों के साथ महंगी सम्पत्ति का त्याग कर दिया ।वे अब एक गांधी टोपी और खादी कपड़े पहनने लगे । 1920-1922 में जवाहर लाल नेहरू ने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और गिरफ्तार भी हुए लेकिन कुछ महीनों के पश्चात उन्हें रिहा कर दिया गया ।

1924 में जवाहर लाल नेहरु इलाहाबाद नगर निगम के चुनाव में अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने दो वर्ष तक शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दी ।यहां का प्रशासनिक अनुभव उनके लिए मूल्यवान साबित हुआ जब वे देश के पहले प्रधानमंत्री बने ।पंडित नेहरू ने अपने कार्यकाल का सदुपयोग करते हुए स्वास्थ्य- सेवा , सार्वजनिक- शिक्षा और साफ- सफाई के विस्तार को मध्य नज़र रखते हुए काम किया ।ब्रिटिश सरकार का सहयोग न मिलने से उन्होंने 1926 में इस्तीफा दे दिया ।

पंडित नेहरू ने 1926-1928 तक महासचिव के रूप में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में अपनी सेवाएं दी ।और वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में किया गया
।इस सत्र के दौरान सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरू ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का पक्ष रखा और समर्थन किया ।जबकि अन्य नेताओं के साथ मोतीलाल नेहरू ब्रिटिश सरकार के अंदर ही प्रभुत्व सम्पूर्ण राज्य चाहते थे ।इस मुद्दे को गंभीर रूप से सोचविचार कर हल करने के लिए महात्मा गांधी ने बीच का रास्ता दिखाते हुए कहा कि भारत के राज्य का दर्जा देने के लिए ब्रिटेन को “दो साल का समय” दिया जायेगा । ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस के द्वारा पूर्ण रूप से “राजनैतिक स्वतंत्रता” के पक्ष में राष्ट्रीय आंदोलन शुरू कर दिया जाएगा ।जब पंडित जवारहलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने ब्रिटिश सरकार से समय को कम से कम एक साल कर दिया जाए करने की मांग की तो सरकार की तरफ से कोई जबाव नहीं मिला ।
कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन 1929 दिसंबर , लाहौर में आयोजित हुआ जिसमें कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को चुना गया ।चुनाव के समय में नेहरूजी ने पार्टी के बाहर रहते हुए भी पार्टी के लिए ज़ोर शोर से राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया । लगभग कांग्रेस ने हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केंद्रीय असेम्बली में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की ।1936 और 1937 से लेकर 1946 में नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए ।और गांधी जी के साथ राष्ट्रव्यापी आंदोलन में सक्रिय रूप से दूसरे नंबर के नेता बन गए ।भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्हें 1942 में गिरफ्तार भी किया गया और बाद में 1945 में छोड़ दिया गया । भारत- पाकिस्तान- विभाजन के दौरान आज़ादी के मुद्दे पर ब्रिटिश सरकार के साथ हुए बातचीत में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

पंडित नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री 1947 में बने । पाकिस्तान के साथ नए समझौते पर बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन और दंगे,भारतीय संघ में करीब करीब पांच सौ रियायतों का एकीकरण ,नए संविधान का निर्माण और निर्देशन,संसदीय लोकतंत्र कार्यप्रणाली के लिए राजनैतिक तथा प्रशासनिक ढांचे की स्थापन आदि विकट और चुनौतियों से भरे समय का सामना पंडित नेहरू ने प्रभावी तरीके से किया ।

भारत के विकास के लिए पंडित नेहरू का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।इन्होनें योजना आयोग का गठन करते हुए साइंस और टेक्नोलॉजी के विकास को बढ़ावा दिया और तीन पंचवर्षीय योजनाओं का लगातार शुभारंभ किया ।देश में उनकी नीतियों के कारण कृषि और उद्योग से एक नए युग की शुरुआत हुई।भारत की विदेश नीति विकास में नेहरू जी ने मुख्य भूमिका निभाई । एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए पंडित नेहरू ने नासिर और टिटो के साथ मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन की रचना रची ।पंडित नेहरू कोरियाई युद्ध का पतन करने और स्वेज नहर विवाद सुलझाने तथा कांगो समझौते के पक्ष में भारत की सेवाओं और इंटरनेशनल पुलिस व्यवस्था की पेशकश को मूर्तरूप देने जैसे विभिन्न इंटरनेशनल समस्याओं के समाधान में प्रमुख रूप से अपना योगदान दिया और मध्यस्थ भूमिका में रहे ।

लाओस, अस्ट्रिया,बर्लिन जैसे अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के समाधान के लिए भी उनका योगदान पर्दे के पीछे रहकर भी सुझाव और सलाह के तौर पर महत्वपूर्ण रहा।

पंडित नेहरू चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के आपसी तालमेल और सम्बन्धों में सुधार नहीं कर पाए।चीन के साथ सीमा विवाद रास्ते के पत्थर साबित हुए और पाकिस्तान के एक समझौते पर आने के बाद कश्मीर मुद्दा सामने आया ।भारत पर चीन ने 1962 में हमला बोल दिया जिसका पूर्वानुमान लगाने में नेहरू असफल रहे ।ये वारदात उनके लिए एक बहुत बड़ी नाकामयाबी थी और उनकी मौत भी शायद इस असफलता के कारण हुई। पंडित जवाहलाल नेहरू की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से 27 मई 1964 को हुई।।

पंडित जवाहरलाल नेहरु की वीडियो में जीवनी देखे ।